मोटर साइकिल मिस्त्री मन्नू भाई के बाद उसे एक और उस्ताद मिला-'डॉक्टर'। यह कोई एमबीबीएस या झोला छाप डॉक्टर का ज़िक्र नहीं, बल्कि सरदार शमशेर सिंह डोज़र ऑपरेटर का किस्सा है।
सरदार शमशेर सिंह कहा करता--''सर दर्द, कमर दर्द, बुखार की दवा लिखने वाला जब डॉक्टर कहलाता है तो तमाम रोगों को दूर भगाने वाली दारू की सलाह देने वाले को डॉक्टर क्यों नहीं कहा जाता?''
दूसरे डॉक्टर वह होते हैं जो किसी खास विषय पर शोध करते हैं और विश्वविद्यालय से उन्हें 'डॉक्टरेट' की डिग्री मिलती है। अधिकांश लोगों को यह डिग्री गहन अध्ययन के पश्चात मिलती हैं और कुछ लोगों को उनकी विलक्षण प्रतिभा के कारण विश्वविद्यालय स्वयं 'डी लिट' की मानद उपाधि से सम्मानित करता है।
सरदार शमशेर सिंह को दारू के क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त थी, इसलिए फुटपथिया विश्वविद्यालय के कुलपतियों ने उसे मानद 'डॉक्टरेट' की उपाधि से सम्मानित किया था। डॉक्टर की शागिर्दी में यूनुस 'बुलडोज़र' और'पेलोडर' चलाना सीख गया। 'पोकलैन' भी वह बहुत बढ़िया चलाता।
'पोकलैन' हाथी की सूंड की तरह का एक खनन-यंत्र है, जिसके 'बूम' और 'बकेट' का 'मूवमेंट' ठीक हाथी की सूंड के जैसा है। जिस तरह से कोई हाथी अपनी सूंड की मदद से ऊंचे-ऊंचे पेड़ों से हरी-भरी डालियां तोड़कर उसी सूंड की सहायता से ग्रास अपने मुंह में डालता है, उसी तरह से 'पेलोडर' मशीन काम करती है।
शायद दुनिया के तकनीशियनों, अभियंताओं, सर्जकों और वास्तुकारों ने प्राकृतिक तत्वों और जीव-जंतुओं की उपस्थिति से प्रेरणा प्राप्त कर अपनी कुशलता और दक्षता में वृध्दि की है।
कोयला की खुली खदानों और धरती की काया-कल्प कर देने वाली परियोजनाओं की जान हैं ये भीमकाय उपकरण। चाहे विशालकाय पहाड़ कटवा कर चटियल मैदान बना दें या बड़ी-बड़ी नहरें खोद डालें।
यूनुस के हुनर की सभी तारीफ़ करते। वह 'डॉक्टर' का चेला जो ठहरा!
'डॉक्टर' अब रिटायर हो चुका है।
अपने खालू का यूनुस इसीलिए अहसान माना करता कि उन्होंने 'डॉक्टर' से उसके लिए सिफारिश की।'डॉक्टर' के कारण ठेकेदारों में आज उसकी अपनी 'मार्केट-वैल्यू' है।
खाला ने उसे काफी समझाया था कि वह अपनी ज़िंदगी को खुद एक नए सांचे में ढाले। अपने बड़े भाई सलीम की तरह हड़बड़ी न करे।
जो भी काम सीखे पूरी लगन और ईमानदारी के साथ सीखे। खाला कहा करती थी-''सुनो सबकी, लेकिन करो मन की। दूसरों के इशारे पर नाचना बेवकूफी है।''
इसीलिए काम सीखने के लिए यूनुस ने खाला की सलाह मानी।
उसने 'डॉक्टर' की दारू या अन्य ऐब नहीं बल्कि उसके हुनर को आत्मसात किया। यही यूनुस की पूंजी थी।
यूनुस ने कोई कसर न छोड़ी काम सीखने में।
'डॉक्टर' को स्वीकार करना पड़ा कि उसने आज तक इतने चेले बनाए किन्तु इस 'कटुए' जैसा एक भी नहीं। बहुत से शागिर्द बने, जिनने उससे शराब पीनी सीखी। नशे में धुत रहना सीखा। रंडीबाजी सीखी किन्तु काम न सीखा।
इसीलिए यूनुस को वह कहा करता-''ये बड़ा लायक चेला निकला।'' यूनुस को अब भी सिहरन होती है, जाड़े की उन कड़कड़ाती अंधेरी रातों को यादकर। जब कोयले की ओपन-कास्ट खदान के 'डम्पिंग-एरिया' में वह डॉक्टर के साथ काम सीखने जाया करता था।
सिंगरौली क्षेत्र मे कोयले की बड़ी-बड़ी खुली खदानें हैं।
मध्यप्रदेश और उत्तर-प्रदेश की सीमा पर कोयले का अकूत भण्डार है सिंगरौली क्षेत्र में। रिहन्द नदी पर बांधा गया विशालकाय बांध। कोयला और पानी के योग से बिजली बनाने के बड़े-बड़े विद्युत-गृह। लाखों टन कोयले से बनने वाली हज़ारों मेगावाट बिजली। इस बिजली की राष्ट्रीय पूर्ति में सिंगरौली क्षेत्र की पर्याप्त हिस्सेदारी है।
सिंगरौली क्षेत्र देश का एक प्रमुख ऊर्जा-तीर्थ है।
एक बार में एक सौ बीस टन कोयला ढोकर चलने वाले भीमकाय डम्पर। सैकड़ों टन बारूद की ब्लास्टिंग से चूर-चूर चट्टानों का पहाड़ अपनी पीठ पर उठाए, अलमस्त हाथी की तरह झूम-झूम कर चलते डम्पर। उन डम्परों के चलने से ऐसा शोर होता ज्यों सैंकड़ों सिंह दहाड़ रहे हो। एक-एक डम्पर एक बड़ी फैक्टरी के बराबर हैं।
डम्पर के चलने के लिए चौड़ी सड़के बनाई जाती हैं। इन्हें हॉल-रोड कहा जाता है। हॉल-रोड पर डम्पर चलने के पूर्व पानी के टेंकर से जल-सिंचन किया जाता है ताकि धूल के बादल न उठें। बालुई पत्थर की धूल फेफड़े के लिए नुकसानदेह होती है। फेफड़े के छिद्रों में कोयला और पत्थर की धूल के असुरक्षित सेवन से खदान-कर्मियों को न्यूमोकोनियोसिस, सिलकोसिस जैसी बीमारियां हो जाती हैं।
सिंगरौली क्षेत्र की कोयला खदानों में बड़ी-बड़ी ड्रेगलाईनें हैं। जमीन की सतह से डेढ़ सौ फिट तक गहरे से मिट्टी खोदकर तीन सौ फिट की दूरी पर ले जाकर 'डम्प' करने वाला यंत्र 'ड्रेगलाईन'। यूनुस बड़े शौक़ से उस भीमकाय यंत्र को चलते हुए देखा करता, एकदम मंत्रमुग्ध होकर। रस्सों के सहारे 'बकेट'का संचालन। लम्बे-लम्बे 'बूम' पर घिर्रियों के सहारे रस्सों का अद्भुत खेल। 'डॉक्टर' उर्फ शमशेर सिंह एक दिन यूनुस को ड्रेगलाईन दिखाने ले गए। पास जाकर उसे डर लगा था। रात का समय। सैकड़ों बल्बों के प्रकाश से ड्रेगलाईन का चप्पा-चप्पा प्रकाशमान था। इतनी रोशनी कि आंखें चुंधिया जाएं। इतने बल्ब कि गिना न जा सके। मार्चिंग पैड से लेकर बूम के टॉप तक तेज़ रोशनी के सर्चलाईटें। 'डॉक्टर'उसे एक जीप में बिठाकर ड्रेगलाईन तक ले गया था। जीप पांच सौ मीटर की दूरी पर रोक दी गई। वहां से अब पैदल जाना था। उतनी बड़ी ड्रेगलाईन के समक्ष इंसान कितना बौना नज़र आता है। हाथी के समीप चींटी की सी हैसियत। ड्रेगलाईन एक घण्टे में एक हज़ार मज़दूरों के एक माह काम के बराबर मिट्टी हटाती है। इसे मात्र एक आदमी चलाता है। ड्रेगलाईन-आपरेटर। जिसका वेतन खदान के सभी श्रमिकों से ज्यादा होता है।
ड्रेगलाईन के पीछे दो डोज़र लगातार चल रहे थे। वे ड्रेगलाईन की अगली 'सीटिंग' के लिए समतल जगह बना रहे थे।
डॉक्टर ने यूनुस से कहा कि घूमती हुई ड्रेगलाईन में चढ़ना होगा। ड्रेगलाईन का मार्चिंग-पैड ही ज़मीन से बीस फुट ऊंचा था। उस पर सीढ़ी लगी थी। डॉक्टर उचक कर उस सीढ़ी पर चढ़ गया और जल्दी-जल्दी ऊपर चढ़ने लगा। यूनुस ने भी उसका पीछा किया। अब वे मार्चिंग-पैड पर थे। ड्रेगलाईन अपनी जगह पर बैठे-बैठे घूम-घूम कर मिट्टी उठाकर फेंक रहा था। फिर डॉक्टर पचास फुट ऊंचे मशीन-रूम की तरफ जाने वाली सीढ़ी पर चढ़ने लगा। यूनुस भी पीछे-पीछे चढ़ गया। मशीन-रूम से गरम हवा निकल रही थी, जिससे अब ठंड लगनी कम हो गई थी। मशीन-रूम का दरवाज़ा बंद था। डॉक्टर ने धक्का मारकर दरवाज़ा खोला तो यंत्रों के चलने से उत्पन्न भयानक शोर से लगा कि कान के पर्दे फट जाएंगे। यूनुस ने कान हाथों से बंद कर लिए। मशीन-रूम में बड़े-बड़े मोटर, जेनेरेटर और जाने कितने उपकरण लगे थे। जिनके चलने से वहां शोर था।
डॉक्टर युनुस को ड्रेगलाईन की क्रियाविधि के बारे में बताने लगा। डम्प-रोप को घुमाने के लिए ड्रम लगा हुआ है। ड्रेग-रोप घुमाने के लिए ड्रम किधर है। यूनुस ने जाना कि आठ-दस फैक्टरियों के बराबर ड्रेगलाईन में मोटर-जेनेरेटर लगे हैं।
फिर वे लोग आपरेटर केबिन की तरफ गए। दो दरवाज़ा खोलने पर एक कारीडार मिला। जिसपर कालीन बिछा हुआ था। यहां तकनीशियन आराम कर रहे थे। डॉक्टर ने यहां अपना जूता उतारा। यूनुस ने भी जूते उतारे। फिर एक कांच का दरवाज़ा खोल कर वे आपरेटर केबिन में जा पहुंचे। एकदम वातानुकूलित कमरा। कांच का घर। पीछे तरफ वायरलैस-सेट। बीच में आपरेटर की सीट। जिसपर एक सरदारजी आराम से बैठकर हाथ और पैर के संचालन से ड्रेगलाईन चला रहे थे। यूनुस को लेकर डॉक्टर सामने की तरफ आ गया। यहां से नीचे कोयले की परत दिखलाई दे रही थी। जिसके ऊपर के ओभर-बर्डन को ड्रेगलाईन की बकेट से उठाकर सरदारजी तीन सौ फुट दूर किनारे डाल रहे थे। इस फेंकी हुई मिट्टी का एक नया पहाड़ बनता जा रहा था। बड़ी लय-ताल बध्द क्रिया थी ड्रेगलाईन की।
ड्रेगलाईन-आपरेटर के सामने और दोनों तरफ जाने कितने लीवर, बटन और सिग्नेलिंग-लाईट्स लगे हुए थे। बीच-बीच में सरदारजी कंट्रोल-रूम से वायरलैस के ज़रिए बात करता जाता था। फिर सरदारजी ने डॉक्टर की फरमाईश पर असिस्टेंट से कहा कि डॉक्टर को 'पांगड़ा' सुनवा दे यारा!
यूनुस ने उस दिन वहां चाय भी पी। आपरेटर की सुख-सुविधा का वहां पूरी व्यस्था थी। यदि वह थक जाए या उसे हाजत लगी हो तो असिस्टेंट मौजूद रहता, जो ड्रेगलाईन आपरेशन ज़ारी रखता।
ऐसी ही एक और हैरत-अंगेज़ मशीन है ड्रीलिंग-मशीन। ये ज़मीन में एक सौ पचास फुट गहरे और एक फुट व्यास के छेद करती है। जिनमें डेढ़ से दो टन बारूद डालकर ब्लास्टिंग की जाती है। एक बार में चार-पांच सौ टन बारूद की ब्लास्टिंग होती है। आस-पास का इलाका दहल जाता है। धूल और रंग-बिरंगी गैसों के बादल काफी देर तक छाए रहते हैं। कहते हैं कि सिंगरौली क्षेत्र में खदान खुलने से पहले हर तरह के जंगली जानवर रहा करते थे। यह एक अभ्यारण्य की तरह था। खदान खुलने से जंगलात कम हुए। नगर बसे। जानवर जाने कहां गायब हो गए। आज भी सियार, मोर, लोमड़ी और बनमुर्गियां यहां नज़र आते हैं। कई लोग बाघ आदि देखने का दावा भी करते हैं।
धरती के गर्भ में सदियों से छिपी है कोयले की मोटी परतें।
कोयले की परत के ऊपर सख्त बालुई परतदार तलछट चट्टानें हैं।
यूनुस ने ओभरमैन मुखर्जी दा से एक बार पूछा था कि दादा, ये कोयला बना कैसे?
बांग्लादेश से रांची आकर बसे मुखर्जी दा के सामने के दो दांत टूटे हुए हैं। वह कुछ भी कहें 'हत् श्शाला' कहे बिना अपनी बात पूरी न करते।
उन्होंने बताया कि करोड़ों बरस पूर्व यहां घने जंगल हुआ करते थे। फिर महाजलप्लावन हुआ होगा और वे सारे जंगलात पानी में डूब गए होंगे। पेड़-पौधे, वन्य-जन्तु, वनस्पतियां आदि सड़-गलकर कार्बनिक पदार्थों में तब्दील हो गए। कालांतर में उन पर बालू-मिट्टी की परतें जमती चली गईं। धीरे-धीरे उच्च-ताप और दाब सहते-सहते जंगलात कोयले में बदल गए होंगे। इसीलिए अभी भी इन कोयले की परतों में वृक्षों के फासिल्स यानी जीवाश्म पाए जाते हैं।
कोयला कहीं-कहीं धरती की सतह के काफी नीचे मिलता है। उसकी क्वालिटी अच्छी होती है। उसक कोयले को निकालने के लिए सुरंगें बनाई जाती हैं या चानक खोदे जाते हैं। ऐसी खदानों को अण्डर-ग्राउण्ड खदानें कहा जाता है।
जिन स्थानों में कोयले की परत धरती की सतह से थोड़ा-बहुत नीचे मिलती है, उन कोयले की परतों का खनन 'ओपन-कास्ट' विधि से किया जाता है। ऐसी खदानें ओपन-कास्ट माईन या खुली खदानें कहलाती हैं।
ब्लास्टिंग के बाद चूर्ण हुई चट्टानों को शावेल जैसे उत्खनन यंत्र खोदकर डम्परों पर लाद देते हैं। इन चट्टानों के चूर्ण को खनन-शब्दावलि में 'ओभर-बर्डन' कहा जाता है। ओभर-बर्डन को डम्परों के ज़रिए डम्पिंग-एरिया में भेजा जाता है। 'डम्पिंग एरिया' में ओभर-बर्डन डम्प होते-होते एक पहाड़ सा बन जाता है।
सदियों पुराने पहाड़ कटकर ओभर-बर्डन के नए पहाड़ों में बदल जाते हैं। ओभर-बर्डन के पहाड़ इंसान के हाथ की रचना हैं। इन नए पहाड़ों की चोटियों को समतल कर उन पर वृक्षारोपण किया जाता है।
क्ोयला निकल जाने के बाद बाकी बचे गङ्ढे को कृत्रिम झील में बदल दिया जाता है। इसी डम्पिंग-एरिया में बुलडोज़र चला करते हैं, जो डम्पर द्वारा लाई गई चट्टानों को 'डोज़' कर समतल बनाता है, ताकि उन पर दुबारा डम्पर आकर ओभर-बर्डन की डम्पिंग कर सकें।
यूनुस उसी बुलडोज़र की आपरेटरी सीखने खदान आया करता।
डम्प्ािंग-एरिया में शेर की तरह दहाड़ते डम्पर आते तो उन्हें देख कलेजा दहल जाता। डम्पर आपरेटर जब रिवर्स-गियर लगाता तो उसका आडियो-विजुअल अलार्म बजने लगता-पीं पां पीं पांकृ
डम्पर पीछे चलकर बुलडोजर से बनाई गई मेड़ पर आकर रूकता। फिर डम्पर आपरेटर 'डम्प लीवर' उठाता और ओभर-बर्डन का ढेर भरभराकर सैकड़ों फिट नीचे गहराई में गिर जाता। कुछ माल मेड़ पर बच जाता जिसे डोजर-आपरेटर, डोजर की सहायता से साफ करता। ताकि अगला डम्पर उस जगह पर आकर सुरक्षित'अनलोड' कर सके।
डम्पिंग क्षेत्र में किनारे की मेड़ बनाना ही असली हुनर का काम है। उस मेड़ को 'बर्म' कहा जाता है। अगर ये बर्म कमजोर बनें तो डम्पर के अनियंत्रित होकर नीचे लुढ़कने का खतरा बना रहता है। असुरक्षित डम्पिंग-क्षेत्र में कई दुर्घटनाएं घट चुकी हैं।
इससे करोड़ों रूपए की लागत से आयातित डम्पर दुर्घटनाग्रस्त होते हैं और कई बार आपरेटर की जान भी जाती है। बुलडोजर से डोजिंग करना एक तरह की कला है। जिस तरह मूर्तिकार छेनी-हथोड़ी से बेजान पत्थरों पर जान फूंकता है, उसी तरह कुशल डोज़र-आपरेटर, डोजर की ब्लेड के कलात्मक इस्तेमाल से ऊबड़-खाबड़ धरा का रूप बदल देता है।
यूनुस अपनी बेजोड़ मेहनत और लगन से जल्द ही इस हुनर में माहिर हो गया।
इससे उसके पियक्कड़ उस्ताद 'डॉक्टर' का भी लाभ हुआ।
सेकण्ड-शिफ्ट की डयूटी में शाम घिरते ही यूनुस को बुलडोज़र पकड़ा कर 'डॉक्टर' दारू-भट्टी चला जाता।
कोयला खदान के श्रमिकों और कुछ अधिकारियों के मन में ये धारणा है कि दारू-शराब फेफड़े में जमी कोयले की धूल को काट फेंकती है। साथ ही एक नारा और गूंजता कि दारू के बिना खदान का मज़दूर ज़िंदा नहीं रह सकता।
इसीलिए कोयला-खदान क्षेत्र में दारू के अड्डे बहुतायत में मिलते हैं।
लोक कहते कि मरने के बाद कोयला खदान के मजदूरों को जलाने में लकड़ी कम लगेगी, क्योंकि उनके फेफड़े में वैसे भी कोयले की धूल जमी होगी, जो स्वत: जलेगी।
मुखर्जी दा कहते-''ये आदमी भी श्शाला गुड-क्वालिटी का कोयला होता है।''
यूनुस ने कभी दारू नहीं पी।
हो सकता है इसके पीछे खाला-खालू का डर हो, या मन में बैठी बात कि मुसलमानों के लिए शराब हराम है। ठीक इसी तरह यूनुस बिना तस्दीक के बाहर गोश्त नहीं खाता। उसे पक्का भरोसा होना चाहिए कि गोश्त हलाल है, झटका नहीं। दोस्तों के साथ पार्टी-वार्टी में वह मछली का प्रोग्राम बनवाता या फिर शाकाहारी खाना खाता।
ओपन कास्ट कोयला खदान की हैवी मशीनों को चलाना सीखने के बाद उसमें आत्मविश्वास जागा।
सरकारी नौकरी तो मिलने से रही, हां अब वह बड़ी आसानी से किसी प्राईवेट नौकरी में तीन-चार हजार रूपए महीना का आदमी बन गया था।
खालू ने यूनुस के लिए कोयला-परिवहन करने वाली कम्पनी 'मेहता कोल एजेंसी' यानी 'एमसीए' के मैनेजर से बात की।
मैनेजर ने जवाब दिया कि जगह खाली होने पर विचार किया जाएगा।
खालू जान गए कि प्राईवेट में भी हुनर के बदौलत नौकरी का जुगाड़ कर पाना उनके बस की बात नहीं,इसलिए वह हार मान गए।
लेकिन खाला कहां हार मानने वाली थीं।
मज़दूर यूनियन के नेता चौबे जी से खाला की अच्छी बोलचाल थी। चौबेजी उनके मैके गांव के थे। कॉलरी में इस तरह के सम्बंध काफी महत्व रखते हैं।
खाला के निमंत्रण पर चौबेजी एक दिन क्वाटर आए तो यूनुस दौड़कर उनके लिए दो बीड़ा पान ले आया। पान चबाते हुए चौबेजी ने कहा था-''सबेरे दस बजे मेहतवा के आफिस पर लइकवा को भेज दें। आगे जौन होई तौन ठीकै होई।''
और वाकई, चौबेजी की बात पर उसे अस्थाई तौर पर काम मिल गया।
'परमानेंट' के बारे चौबेजी को विश्वास दिलाया गया कि काम देखकर जल्द ही बालक को परमानेंट कर दिया जाएगा।
एक बात ज़रूर यूनुस को सुना दी गई कि कम्पनी अपनी आवश्यकतानुसार, काम पड़ने पर अपने कर्मचारियों को देश के किसी भी हिस्से में काम करने भेज सकती है। एमसीए का कारोबार बिहार, बंगाल, झारखण्ड,एमपी और छत्तीसगढ़ में फैला है। इनमें से किसी भी प्रान्त में उन्हें भेजा जा सकता है।
मरता क्या न करता, यूनुस ने तमाम शर्तें मान लीं।
इसके अलावा कोई चारा भी तो न था।
भीमकाय सरकारी डम्परों में लदकर कोयला कोल-यार्ड तक पहुंचता।
जहां उनमें से शेल-पत्थर आदि को छांटा जाता है। कोल-यार्ड को पहली निगाह में कोई बाहरी आदमी कोयला-खदान ही समझेगा। सैकड़ों एकड़ में फैले विस्तृत-क्षेत्र में कोयले के टीले। इन्हें अब प्राईवेट दस-टनिया डम्परों में भरकर रेल्वे साईडिंग तक पहुंचाने का काम एमसीए का था। इन दस-टनिया डम्परों से सीधे ग्राहकों तक भी कोयला पहुंचाया जाता।
कोयला-यार्ड में पेलोडर मशीन से दस-टनिया डम्परों में कोयला भरा करता था यूनुस। उसकी कार्यकुशलता, लगनशीलता, कर्मठता और मृदु-व्यवहार के कारण मुंशी-मैनेजर उसे बहुत मानते थे। कोई उसे छोड़ने को तैयार नहीं था।
न जाने क्यों ऐसे हालात बने कि उसे खाला का घर छोड़ने को निर्णय लेना पड़ गया।
वैसे भी उसे लग रहा था कि उसका दाना-पानी अब उठा ही समझो। वो तो अच्छा हुआ कि बडे भाई सलीम की तरह अकुशल श्रमिकों की श्रेणी में उसकी गिनती नहीं थी। उसकी एक 'मार्केट वैल्यू' बन चुकी है। उसे मालू था कि इस बहुत कुछ पाने के लिए वह ढेर सारा खो भी रहा है। यानी तपती-चिलचिलाती धूप में घनी आम की छांह जैसी अपनी सनूबर को...
वह सनूबर को दिल की गहराईयों से प्यार करता था।
फिल्म 'मुकद्दर का सिकंदर' का एक मशहूर गाना वह अक्सर गुनगुनाया करता-''ओ साथी रे, तेरे बिना भी क्या जीना।' बिग बी अमिताभ की तर्ज पर इसे यूं भी कहा जा सकता है-'सनूबर के बिना जीना भी कोई जीना है लल्लू, अंय...'
क्या अब वह सनूबर से कभी मिल पाएगा?
यूनुस जानता है कि वह सनूबर के लायक नहीं।
मखमल में टाट का पैबंद, यही तो खाला ने उसके बारे में कहा था।
खाला जानती थी कि वह सनूबर को चाहता है। सनूबर भी उसे पसंद करती है, लेकिन सिर्फ एक-दूसरे को चाह लेने से कोई किसी की जीवन-संगिनी तो बन नहीं सकती।
यूनुस के पास सनूबर को खुश रखने के लिए आवश्यक संसाधन कहां?
'माना कि दिल्ली मे रहोगे, खाओगे क्या ग़ालिब?'
अब सनूबर उसकी कभी न हो पाएगी!
दुनिया में कुछ इंसान भाग्यवश स्वर्ग के सुख भोगते हैं और कुछ इंसानों के छोटे-छोटे स्वप्न, तुच्छ सी इच्छाएं भी पूरी नहीं हो पाती हैं.......क्यों?
ऐसे ही कितने सवालों से जूझता रहा यूनुस....
स्त्रह
प्लेटफार्म के मुख्य-द्वार पर एक लड़की दिखी।
यूनुस चौंक उठा।
कहीं ये सनूबर तो नहीं।
वैसी ही पतली-दुबली काया।
उस लड़की के पीछे एक मोटा आदमी और ठिगनी औरत थी, जो शायद उसके मां-बाप हों।
वे प्रथम-श्रेणी के प्रतीक्षालय की तरफ जा रहे थे।
यूनुस सनूबर को बड़ी शिद्दत से याद करने लगा।
उसे याद आने लगीं वो सब बातें, जिनसे शांत जीवन में हलचल मची।
जमाल साहब का खाला के घर में प्रभाव बढ़ता गया। हरेक मामलात में उनकी दखलंदाजी होने लगी।
रमज़ान के महीने में वह रात को खाला के घर में ही रूकने लगे। रमज़ान में सुबह सूरज उगने से पूर्व कुछ खाना पड़ता है, जिसे सेहरी करना कहते हैं। गेस्ट-हाउस में कहां ताज़ा रोटी रात के दो-तीन बजे बनती। इसलिए खाला की कृपा से ये जमाल साहब शाम को जो घर आते तो फिर सुबह फजिर की नमाज़ के बाद ही वापस गेस्ट-हाउस जाते।
ईद में वह नागपुर जाते, लेकिन खाला और खालू की ज़िद के कारण वह अपने माता-पिता और भाई-बहनों के पास नहीं जा पाए।
जाने कैसा जादू कर रखा था खाला ने उन पर...
असली कारण तो यूनुस को बाद में पता चला।
हुआ ये कि इस बीच एक ऐसी बात हुई कि यूनुस को खाला के घर अपनी औकात का अंदाज़ा हुआ।
उस दिन उसने जाना कि यदि यहां रहना है तो अपमानित होकर रहना होगा।
उसने जाना कि पराधीनता क्या होती है?
उसने जाना कि ग़रीबी इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है।
उसने जाना कि पराश्रित होकर जीने से अच्छा मर जाना है।
और उसी समय उसके मन में अपने परों के भरोसे अपने आकाश में उड़ने की इच्छा जागी।
हुआ ये कि सनूबर ने यूनुस के कपड़े बिना धोए यूं ही फींच-फांच कर सुखा दिए थे। कपड़ों में साबुन लगाया ही नहीं था।
ग्रीस-तेल और पसीने की बदबू कपड़े में समाई हुई थी।
यूनुस का पारा सातवें आसमान में चढ़ गया।
उसने आव देखा न ताव, सनूबर की पिटाई कर दी।
सनूबर चीख-चीख कर रोती रही।
खाला ने यूनुस को जाहिल, गंवार, खबीस, राच्छस, भुक्खड़, एहसान-फरामोश और भगौड़ा आदि जाने कितनी उपाधियों से नवाज़ा।
यूनुस उस दिन डयूटी गया तो फिर घर लौटकर न आया। उसने कल्लू के घर रहने की ठान ली थी। जैसे अन्य लड़के जीवन गुज़ार रहे हैं, वैसे वह भी रह लेगा। खाला के घर में हुई बेइज्ज़ती से उसका मन टूट चुका था।
दूसरे दिन जब वह घर न लौटा तो खालू स्वयं एमसीए की वर्कशाप में आए। उन्होंने यूनुस को घूरकर देखा।
फिर पूछा-''घर काहे नहीं आता बे!''
यूनुस खालू से बहुत डरता था।
उसकी रूह कांप गई।
उसने कहा-''ओभर-टाईम कर रहा था। आज आऊंगा।''
खालू मुतास्सिर हुए।
उसकी जान बची।
शाम डयूटी से छूटने पर उसने मनोहरा की होटल से गर्मागर्म समोसे खरीदे। साथ में इमली की खटमीठी चटनी रखवाई। सनूबर को समोसे बहुत पसंद हैं।
वाकई, उसे किसी ने कुछ न कहा।
सभी ने दिल लगाकर समोसे खाए।
खाला के कहने पर सनूबर ने दो समोसे अपने जमाल अंकल के लिए रख दिए।
उस रात सभी ने लूडो खेली।
जमाल अंकल, खाला, सनूबर और यूनुस।
यूनुस के बगल में सनूबर थी और उसके बगल में जमाल अंकल। टी-टेबिल के चारों तरफ बैठे थे वे।
यूनुस ने खेल के दरमियान महसूस किया कि टेबिल के नीचे एक दूसरा खेल ज़ारी है। जमाल अंकल के पैर सनूबर के पैर से बार-बार टकराते हैं। ऐसे सम्पर्क के दौरान दोनों बात-बेबात खूब हंसते हैं।
उसके पल्टे हुए गुलाबी होंठ जब हंसने की मुद्रा में होते तो यूनुस को दीवाना बना जाते थे, लेकिन आज उसे वे होंठ किसी चुड़ैल के रक्त-रंजित होठों की तरह दिखे।
उसे सनूबर की बेवफाई पर बड़ा गुस्सा आया।
उस रात खालू की नाईट-शिफ्ट थी।
खालू खाना खाकर डयूटी चले गए।
जमाल साहब भी जाना चाहते थे कि टीवी पर गुलाम अली की ग़ज़लों का कार्यक्रम आने लगा।
'चुपके-चुपके रात-दिन आंसू बहाना याद है
हमको अब तक आशिकी का वो ज़माना याद है'
मुरकियों वाली खनकदार आवाज़ में गुलाम अली अपनी सुरों का जादू बिखेर रहे थे। यूनुस भी गुलाम अली को पसंद करता था, लेकिन जमाल साहब की रूचि जानकर उसे जाने क्यों गुलाम अली की आवाज़ नकियाती सी लगी। आवाज़ ऐसे लगी जैसे पान की सुपारी गले में फंसी हुई हो।
जैसे जुकाम से नाक जाम हो।
वह टीवी के सामने से हट गया।
अंदर किचन में उसका बिस्तर बिछता था।
चटाई के साथ गुदड़ी लिपटी रहती। सुबह चटाई लपेट दी जाती और रात में वह सोने से पूर्व चटाई बिछा लेता। ओढ़ने के लिए एक चादर थी। तकिया वह लगाता न था।
किचन की लाईट बंद हो तब भी बाहर आंगन की रोशनी खिड़की से छनकर किचन में आती। उसे उस धुंधली रोशनी में सोने की आदत थी।
टीवी वाले कमरे से ठहाके गूंज रहे थे।
यूनुस के कान में कुछ अफ़वाहें पड़ चुकी थीं कि जमाल साहब बड़ा शातिर आदमी है। नागपुर में 'डोनेशन'वाले इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ कर निकला है जमाल साहब। सुनते हैं कि वहां वह गुण्डा था गुण्डा।
उसकी खूब चलती थी वहां।
बाहरी लड़कों से महीना वसूली करता था जमाल साहब।
खालू ने उसे घर घुसा कर अच्छा नहीं किया है।
एक के मुंह से यूनुस ने सुना कि जमाल साहब की नज़र खुली बोरी और बंद बोरी की शक्कर, दोनों में है।
खुली बोरी और बंद बोरी की बात यूनुस समझ सकता था, क्योंकि फुटपाथी विश्वविद्यालय के कोर्स के मुहावरों में ये भी था।
खुली बोरी यानी खाला और बंद बोरी माने सनूबर!
यूनुस को नींद नहीं आ रही थी।
गुलाम अली की आवाज़ किसी तेज़ छुरी की तरह उसकी गर्दन रेत रहे थे-
'तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किसका था'
'वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कि ये कलाम किसका था'
सनूबर की खिलखिलाहट सुनकर यूनुस का दिल रो रहा था।
उसने करवट लेकर अपने कान को कुहनी से दबा लिया।
आवाज़ मध्दम हो गई।
नींद लाने के लिए कलमे का विर्द करने लगा-
'ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह।'
पता नहीं उसे नींद आई या नहीं, लेकिन रात अचानक उसे अपना पैजामा गीला लगा।
हाथ से टटोला तो गीली-चिपचिपी हो गईं उंगलियां, यानी.....
उसका दिमाग खराब हो गया।
नींद उचट गई।
पेशाब का दबाव मसाने पर था।
वह उठा।
खिड़की के पल्लों से छनकर पीली रोशनी के धब्बे कमरे में फैले हुए थे। ठीक उसके पैजामा में उतर आए धब्बों की तरह।
उसे कमज़ोरी सी महसूस हो रही थी। जाने क्यों स्वप्न में हुए स्खलन के बाद उसकी हालत पस्त हो जाती है।
उठने की हिम्मत न हुई।
वह कुछ पल बैठा रहा।
तभी उसके कान खड़े हुए।
पहले कमरे से फुसफुसाने की आवाज़ आ रही थी। तख्त भी हौले-हौले चरमरा रहा था।
यूनुस ने किचन से लगे बच्चों के कमरे में झांका। वहां सनूबर अपने अन्य भाई-बहनों के साथ सोई हुई थी।
इसका मतलब पहले कमरे में खाला हैं। फिर उनके साथ कौन है? खालू की तो नाईट शिफ्ट है।
यूनुस के मन में जिज्ञासा के साथ भय भी उत्पन्न हुआ।
वह दबे पांव पहले कमरे के दरवाज़े की झिर्रियों से अंदर झांकने लगा।
पहले कमरे में भी अंधेरा ही था।
हां, रोशनदान के ज़रिए सड़क के खम्बे से रोशनी का एक बड़ा टुकड़ा सीधे दीवाल पर आ चिपका था।
अंधेरे की अभ्यस्त उसने तख्त पर निगाहें टिकाईं।
देखा खाला के साथ जमाल साहब आपत्तिजनक अवस्था में हैं।
उसकी टांगें थरथराने लगीं।
उसका कंठ सूख गया।
हाथ में जुम्बिश होने लगी।
दिल की धड़कनें तेज़ क्या हुईं कि उसका मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया।
इसी उहा-पोह में वहां से भागना चाहा कि उसके पैरों की आहट सुनकर खाला की दबी सी चीख़ निकली।
यूनुस तत्काल अपने बिस्तर पर आकर लेट गया।
पहले कमरे की गतिविधि में विध्न पैदा हो चुका था। वहां से आने वाली आहटें बढ़ीं। फिर बाहर का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। फिर स्कूटर के स्टार्ट होने की आवाज़ आई और लगा कि फुर्र से उड़ गई हो स्कूटर।
यूनुस को काटो तो खून नहीं।
आंखें बंद किए, करवट बदले वह अब खाला की हरकतों का अंदाज़ा लगाने लगा।
लगता है खाला ने पहले बच्चों के कमरे की लाईट जलाकर वहां का जाएज़ा लिया है।
अब वह किचन की तरफ आ रही हैं।
लाईट जलाकर यहां भी वह यूनुस के पास कुछ देर खड़ी रहीं।
उनका शातिर दिमाग माज़रा समझना चाह रहा था।
फिर वह पुन: पहले कमरे में चली गईं।
यूनुस की जान में जान आई।
वह उसी तरह पड़ा रहा जबकि पेशाब के ज़ोर से मसाने फटने को थे।
जमाल साहब और खाला की हक़ीक़त, सनूबर का जमाल साहब की तरफ झुकाव और सनूबर के साथ जमाल साहब के रिश्ते को लेकर खाला-खालू के ख्वाब...
पूरी पहेली यूनुस के सामने थी।
उस पहेली का हल भी उसके सामने था।
लेकिन उसमें यूनुस का कोई रोल न था...
इस स्थिति से निपटने के लिए यूनुस के दिमाग में एक बात आई।
क्यों न सनूबर को वस्तुस्थिति से अवगत कराया जाए! उसके बाद जो होगा, सो होगा।
अठारह
जब यूनुस डयूटी से घर लौटा, उस समय दिन के बारह बजे थे।
खाला घर में नहीं थीं। हस्बेमामूल खाला पड़ोसियों के घर बैठने गई हुई थीं।
सनूबर लगता है स्कूल नहीं गई थी और किचन में चावल पका रही थी।
यूनुस आजकल सनूबर से ज्यादा बातें नहीं करता। बस, काम भर की बातें। वह सीधे आंगन में पानी की टंकी की तरफ हाथ-मुंह धोने चला गया।
गमछे से मुंह पोंछते हुए वह पहले कमरे में चला गया। पर्दा उठा हुआ था। बाहर से रोशनी अंदर आ रही थी। शायद बिजली नहीं थी, वरना इस घर में टीवी कम ही बंद रहता है।
यूनुस तख्त पर लेट गया।
उसने आंखें बंद कर लीं।
उसके माथे पर गहरी लकीरें थीं।
सनूबर कब आकर दरवाज़े के पास खड़ी हुई उसे पता न चला। जब सनूबर ने दरवाज़ा खोला तो चूं... की आवाज़ से उसकी तंद्रा भंग हुई।
उसने सनूबर के चेहरे को ध्यान से देखा।
उसे लगा कि सनूबर उससे कुछ कहना चाह रही है।
यूनुस उठ बैठा।
उसने सनूबर के पलटे हुए होंठ और भारी पलकों में कैद उदास आंखों को बड़ी हसरत से देखा। कितना प्यार था सनूबर से उसको।
सनूबर तख्त के पास कुर्सी पर बैठ गई।
यूनुस को लगा कि उसके दिल की गहराईयों से आवाज़ गूंजी हो-''सनूबर....!''
सनूबर कुछ न बोली।
''सनूबर, तुम्हें मालूम है, तुम्हारे साथ धोखा हो रहा है।''
यूनुस की बहकी-बहकी बातें सुनकर सनूबर डरी हुई लग रही थी।
''डरो नहीं, ये सच है....तुम्हारे साथ तुम्हारी मम्मी एक खेल खेल रही हैं।''
सनूबर ने अपने कान पर हाथ रख लिए-''क्या बक रहे हो यूनुस..?''
''सच सनूबर, तुम्हें जमाल साहब से हुशियार रहना चाहिए। वह बड़ा धोखेबाज है। मैं कैसे कहूं कि जमाल अंकलवा कितना कमीना है।''
तभी दीवाल घड़ी टनटनाई-'टन्न!'
सनूबर ने घड़ी देखी-''एक बज गए, मम्मी आती होंगी।''
यूनुस की समझ में न आ रहा था कि बीती रात की दास्तान को वह किन लफ्ज़ों में बयान करे।
फिर भी हिम्मत करके वह बोला-''सनूबर! वो जमाल सहबवा तुमसे हमदर्दी का दिखावा करता है और जानती हो वो कितना कमीना है कि सुनोगी तो... अच्छा किसी से बताओगी तो नहीं न!''
सनूबर इतने में झुंझला गई।
''नहीं बाबा, किसी से नहीं कहूंगी, तुम बताओ तो सही।''
''तो सुनो, कल रात मैंने अपनी आंखों से देखा। अल्ला-कसम, कलाम-पाक की कसम जो झूठ बोलूं मुझे मौत आ जाए। मैंने जमाल साहब और खाला को कल रात एक साथ एक बिस्तर पर देखा है सनूबर.... तुम्हें विश्वास हो या न हो ये सच है सनूबर...''
सनूबर ने अपने कान बंद कर लिए।
वह रोने लगी।
''कल रात वो हालात देखने के बाद कहां सो पाया हूं सनूबर!''
यूनुस का मन तो हल्का हुआ लेकिन सनूबर तो जैसे बेजान हो गई।
खाला आईं तो यूनुस आंखें बंद किए सोने का नाटक करता रहा।
सनूबर अपने कमरे में लेटी रही।
खाला यूनुस के पास कुर्सी पर बैठ कर चीखीं -''कहां मर गई कुतिया...''
सनूबर ने जवाब न दिया तो उठ कर अंदर गईं और सनूबर को झिंझोड़कर उठाते हुए बोलीं-''कैसे पसरी है महारानी, खाना-वाना बनेगा या आज हड़ताल है? इसीलिए उनसे कहती हूं कि लड़कियन को पढ़वाईए मत,लेकिन सुनें तब न! आजकल अपने जमाल अंकल की शह पाकर हरामजादी जबान लड़ाना सीख गई है।''
सनूबर कुछ न बोली और उठ बैठी।
यूनुस ने भी आवाज़ सुनकर नींद खुलने का अभिनय किया।
तब तक चिट्टे-पोट्टे स्कूल से घर आ गए और संयोग से लाईट भी आ गई। छुटकी जमीला ने बस्ता यूनुस की गोद पर पटककर टीवी ऑन किया।
टीवी से चिपककर घण्टों वह कार्टून प्रोग्राम देखा करती है।
यूनुस ने देखा कि सनूबर गाली खाकर भी न उठी तो खाला स्वयं किचन में घुसीं।
खाना तो वैसे तैयार ही था।
बस दाल छौंकना बाकी था।
दुपहर में सब्जी बनती न थी। दाल-भात अचार वगैरा के साथ खाया जाता। खालू 'हरियर मिर्च' के साथ खाना खा लेते थे।
दाल छौंक कर खाला ने यूनुस को आवाज़ दी।
यूनुस उठा और किचन के पास दालान में अपनी सोने की जगह नंगे फर्श पर बैठ गया।
सनूबर वैसे ही गुमसुम लेटी रही और खाला के संग यूनुस ने खाना खा लिया।
यूनुस जानता था कि सनूबर इतनी आसानी से उसकी बात पर विश्वास करेगी नहीं। वह अपने तईं छानबीन ज़रूर करेगी।
पता नहीं उसने क्या छानबीन की और उससे उसे क्या हासिल हुआ लेकिन अगली सुबह यूनुस ने अपने बिस्तर पर अपनी बगल में गर्माहट पाई तो जाना कि सनूबर उसकी बगल में लेटी है।
वह घबरा कर उठ बैठा।
सनूबर ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा।
यूनुस ने पहले कमरे और अंदर वाले कमरे की तरफ देखा। आहट लेने की कोशिश की। दीवाल घड़ी पांच बार टनटनाई।
इसका मतलब सभी सो रहे हैं।
खालू तो डयूटी गए हुए हैं।
वह सनूबर की बगल में लेट गया।
सनूबर ने उसे बाहों में भर लिया।
पतली-दुबली सनूबर का नर्म-गुनगुना आलिंगन....
सनूबर उसके कानों में फुसफुसाई-''मुझे भगा कर ले चलो इस जहन्नुम से यूनुस...!''
उस दिन उसे एहसास हुआ कि वह कितना कमज़ोर आदमी है।
उस दिन उसने फैसला किया कि अब वह अपने लिए एक नई ज़मीन तलाशेगा.....
एक नया आसमान बनाएगा.....
एक नए सपने को साकार करेगा.......
समाप्त
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