बुधवार, 31 मार्च 2010

पहचान

पहचान

"जब हमने अपनी पहचान यहीं की बना ली और हम इसी मुल्क में हैं, इसी मुल्क के रहने वाले हैं तो आप पूछते हो कि तुम हिन्दुस्तानी मुसलमान हो या मुसलमान हिन्दुस्तानी?"

-शमशुर्रहमान फ़ारूकी

उन नवयुवकों को

जो ज़िन्दगी में

अपने दम

कुछ बनना चाहते हैं

और किसी संस्था का

नहीं बनना चाहते 'भोंपू'

या कोई 'टूल्स'....

- अनवर सुहैल

संकट

एक

यूनुस एक बार फिर भाग रहा है।

ठीक इसी तरह उसका भाई सलीम भी भागा करता था।

लेकिन क्या भागना ही उसकी समस्या का समाधान है?

यूनुस ने अपना सिर झटक दिया।

विचारों के युध्द से बचने के लिए वह यही तरीका अपनाता।

इस वक्त वह सिंगरौली स्टेशन। के प्लेटफार्म पर खड़ा है।

सिंगरौली रेल्वे स्टेशन।

अभी रात के ग्यारह बजे हैं।

कटनी-चौपन पैसेंजर रात बारह के बाद ही आएगी।

प्लेटफार्म कब्रिस्तान बना हुआ है। ठंड की चादर ओढ़कर सोया

कब्रिस्तान। धुंधली रोशनी में कुहरे की हिलती चादर। लोग चलते तो यूं लगता जैसे कब्रों का रखवाला आकर दौरा कर जाता हो। जहां ऐसा लगता है कि कब्रों से उठकर आत्माएं सफेद, काले कपड़े से बदन लपेटे गश्त कर रही हों।

आजकल भीड़ की कोई वजह नहीं है।

कटनी-चोपन पैसेंजर की यही तो पहचान है कि बोगियों और मुसाफिरों की संख्या समान होती है।

यूनुस को भीड़ की परवाह भी नहीं।

सफ़र में सामान की हिफाजत का भरोसा हो जाए तो वह बैठने की जगह भी न मांगे।

उसके पास सामान भी क्या है? एक एयर-बैग ही तो है।

उसे कहीं भी टिका वह घूम-फिर सकता है।

दिसम्बर की कड़कड़ाती ठंड...

दिखाई देने वाला हर आदमी सिकुड़ा-सिमटा हुआ। बदन पर ढेरों कपड़े लादे। फिर भी ठंड से कंपकंपाए।

इधर ठंड कुछ अधिक पड़ती भी है। बघेल-खंड का इलाका है यह! दांतों को कड़कड़ा देने वाली ठंड के लिए मशहूर सिंगरौली का रेल्वे स्टेशन! पहाड़ी इलाका, कोयला खदान और ताप-विद्युत इकाईयों के कारण मानो जान बच जाती है, वरना ऐसी ठंड पड़ती कि अच्छे-खासे लोग टें बोल जाएं।

स्टेशन-मास्टर के कमरे के बगल में प्रथम एवम् द्वितीय श्रेणी शयनयान के आरक्षित यात्रियों के लिए प्रतीक्षालय है। दरवाज़े में लगे कांच पर धुंध छा गई थी, इसलिए यूनुस ने भिड़काए दरवाजे क़ो ठेलकर भीतर झांका।

वहां एक अधेड़ आदमी और एक स्त्री बैठे हुए थे। एनटीपीसी या फिर कॉलरी का साहब हो। वैसे भी किसी ऐरे-गैरे के लिए प्रतीक्षालय नहीं खोला जाता।

प्रतीक्षालय के बगल में रनिंग-स्टाफ रूम था। फिर उसके बाद आरपीएफ के जवानों के लिए कमरा था।

उस कमरे के बाहर रात्रि-पाली के कर्मचारियों ने सिगड़ी में आग जला रखी थी। चार आदमी आग ताप रहे थे। उनके बीच थोड़ी सी जगह बची थी, जहां एक कुत्ता बदन सेंक रहा था। यूनुस कुत्ते के पास जाकर खड़ा हो गया। सिगड़ी की आंच की सिंकाई से उसे कुछ राहत मिली।

रेल्वे के कर्मचारी अप-डाउन, एईएन, सायरन, डिरेल, सिग्नल आदि शब्दों का उच्चारण कर अपने विचारों का आदान-प्रदान कर रहे थे।

मफलर से आंख छोड़ पूरा चेहरा लपेटे एक कर्मचारी बोला-''भाईजान, आज शाम तबीयत कुछ डाउन लग रही थी। कड़क चाय बनवाकर पी लेकिन पिकअप न बना। ऐसे सिग्नल मिले कि लगा इस बार पायलट डिरेल हुआ, तो फिर उठाना मुश्किल होगा। तभी दिमाग में सायरन बजा और तुरंत भट्टी पहुंचे। वहां फोर-डाउन वाला मिसरवा गार्ड मिल गया। दोनों ने मिल कर मूड बनाया। तब जाकर जान बची।''

यूनुस थोड़ी देर उनकी बात से लुत्फ उठाता रहा, फिर स्टेशन से बाहर निकल आया।

बाहर एक बड़ा सा पार्क है। पार्क के दोनों ओर दो सड़कें निकली हैं। दोनों सड़कें आगे जाकर मेन-रोड से मिलती हैं।

पार्क के सामने रोड के किनारे-किनारे, एक लाईन से कई टेक्सियां और एक मिनी-बस खड़ी थी। इन टेक्सियों या मिनी बसों के चालक अमूमन उनके मालिक होते हैं।

एक पेड़ का मोटा सा सूखा तना सुलगाए वे आग ताप रहे थे।

एक खलासीनुमा चेला चिलम बना रहा था।

यूनुस वहां रूका नहीं।

वह बाईं ओर की ढाल-दार सड़क पर चल पड़ा। मेन-रोड के उस पार तीन-चार होटल हैं।

ये होटल चौबीस घण्टे सर्विस देते हैं। उन होटलों में लालटेन जल रही थी।

उसने होटल का जायजा लिया। पहला छोड़ दूसरे होटल में एक महिला भट्टी के पास खड़ी चाय बना रही थी।

यूनुस उसी होटल में घुसा।

सीधे भट्टी के पास पहुंच गया। उसने कंधे पर टंगा एयर-बैग उतार कर एक कुर्सी पर रख दिया। फिर हथेलियों को आपस में रगड़ते हुए आग तापने लगा।

महिला ने उसे घूरकर देखा।

यूनुस को उसका घूरना अच्छा लगा।

वह तीस-बत्तीस साल की महिला थी। भट्टी की लाल आंच और लालटेन की पीली रोशनी के मिले-जुले प्रभाव में उसका चेहरा भला लग रहा था। जैसे तांबई-सुनहरी आभा लिए कोई कांस्य-कृति।

महिला ने चाय केतली में ढालते हुए पूछा-''क्या चाहिए?''

यूनुस ने मजा लेना चाहा-''यहां क्या-क्या मिलता है?''

महिला ने उसे घूरकर देखा, फिर जाने क्या सोचकर हंस दी।

होटल के तीन हिस्से थे। आधे हिस्से में ग्राहक के बैठने की जगह। आधे हिस्से को दो भागों में टाट के पर्दे से अलग किया गया था। सामने का भाग रसोई के रूप में था और बाकी आधा हिस्से में लगता ह,ै उसकी आरामगाह थी।

आरामगाह से किसी वृध्द के खांसने की आवाज़ आई, साथ ही लरज़ती आवाज़ में एक प्रश्न-''पसिन्जर आ गई का?''

महिला ने जवाब दिया-''अभी नहीं ।''

यूनुस को टाईम-पास करना था, सो उसने आर्डर दिया-''कड़क चाय, चीनी-पत्ती तेज रहेगी।''

महिला उसकी मंशा समझ गई।

उसने बर्तन में स्पेशल चाय के लिए दूध डाला और फिर ढेर सारी पत्ती डालकर चाय खूब खौला दी।

चाय उसने दो गिलासों में ढाली।

एक चाय यूनुस को दी और दूसरी स्वयं पीने लगी।

यूनुस ने महसूस किया कि ठंड इतनी ज्यादा है कि चाय गिलास में ज्यादा देर गरम न रह पाई।

यूनुस ने चुस्की लेते हुए चाय का आनंद उठाया।

उसे अपने 'डाक्टर-उस्ताद' की बात याद हो आई...

डोज़र आपरेटर शमशेर सिंह उर्फ 'ड़ाक्टर-उस्ताद' को ठंड नहीं लगती थी। वह कहा करता कि ठंड का इलाज आग या गर्म कपड़े नहीं बल्कि शराब, शबाब और कबाब है।

यूनुस ने शराब तो कभी छुई नहीं थी, किन्तु शबाब या कबाब से उसे परहेज़ न था।

शबाब के लिए तो वैसे भी सिंगरौली क्षेत्र बदनाम है।

औद्योगिक विकास की आंधी के कारण देश भर के उद्योगपति-व्यवसायी, टेक्नोक्रेट और कुशल- अकुशल श्रमिक-शक्ति सिंगरौली क्षेत्र में डेरा डाले हुए हैं। पहले तो लोग बिना परिवार के यहां आते हैं। बिना रहाईशी इंतेज़ाम के ये लोग हर तरह की ज़रूरत की वैकल्पिक व्यवस्था के अड्डे तलाश कर लेते हैं। इसीलिए यहां ऐसे कई गोपनीय अड्डे हैं जहां जिस्म की भूख मिटाई जाती है।

ऐसे ही एक अड्डे से प्राप्त अनुभव को यूनुस ने याद किया।

दो

कल्लू नाम था उसका। वह बीना की खुली कोयला खदान में काम करता था।

यूनुस तब वहां कोयला-डिपो में पेलोडर चलाया करता था। वह प्राइवेट कम्पनी में बारह घण्टे की डयूटी करता था। तनख्वाह नहीं के बराबर थी। शुरू में यूनुस डरता था, इसलिए ईमानदारी से तनख्वाह पर दिन गुजारता था।

तब यदि खाला-खालू का आसरा न होता तो वह भूखों मर गया होता।

फिर धीरे-धीरे साथियों से उसने मालिक-मैनेजर-मुंशी की निगाह से बच कर पैसे कमाने की कला सीखी। वह पेलोडर या पोकलेन से डीजल चुरा कर बेचने लगा। अन्य साथियों की तुलना में यूनुस कम डीजल चोरी करता, क्योंकि वह दारू नहीं पीता था।

कल्लू उससे डीजल खरीदता था।

खदान की सीमा पर बसे गांव में कल्लू की एक आटा-चक्की थी। वहां बिजली न थी। चोरी के डीजल से वह चक्की चलाया करता।

धीरे-धीरे उनमें दोस्ती हो गई।

अक्सर कल्लू उससे प्रति लीटर कम दाम लेने का आग्रह करता कि किसके लिए कमाना भाई। जोरू न जाता फिर क्यूं इत्ता कमाता। उनमें खूब बनती।

फुर्सत के समय यूनुस टहलते-टहलते कल्लू के गांव चला जाता।

कालोनी के दक्खिनी तरफ, हाईवे के दूसरी ओर टीले पर जो गांव दिखता है, वह कल्लू का गांव परसटोला था।

परसटोला यानी गांव के किनारे यहां पलाश के पेड़ों का एक झुण्ड हुआ करता था। इसी तरह के कई गांव इलाके में हैं जो कि अपनी हद में कुछ ख़ास पेड़ों के कारण नामकरण पाते हैं, जैसे कि महुआर टोला, आमाडांड़, इमलिया, बरटोला आदि। परसटोला गांव में फागुन के स्वागत में पलाश का पेड़ लाल-लाल फूलों का श्रृंगार करता तो परसटोला दूर से पहचान में आ जाता।

परसटोला के पश्चिमी ओर रिहन्द बांध की पानी हिलोरें मारता। सावन-भादों में तो ऐसा लगता कि बांध का पानी गांव को लील लेगा। कुवार-कार्तिक में जब पानी गांव की मिट्टी को अच्छी तरह भिगोकर वापस लौटता तो परसटोला के निवासी उस ज़मीन पर खेती करते। धान की अच्छी फ़सल हुआ करती। फिर जब धान कट जाता तो उस नम जगह पर किसान अरहर छींट दिया करते।

रिहन्द बांध को गोविन्द वल्लभ पंत सागर के नाम से भी जाना जाता है। रिहन्द बांध तक आकर रेंड़ नदी का पानी रूका और फिर विस्तार में चारों तरफ फैलने लगा। शुरू में लोगों को यकीन नहीं था कि पानी इस तरह से फैलेगा कि जल-थल बराबर हो जाएगा।

इस इलाके में वैसे भी सांमती व्यवस्था के कारण लोकतांत्रिक नेतृत्व का अभाव था। जन-संचार माध्यमों की ऐसी कमी थी कि लोग आज़ादी मिलने के बाद भी कई बरस नहीं जान पाए थे कि अंग्रेज़ी राज कब ख़त्म हुआ। गहरवार राजाओं के वैभव के क़िस्से उन ग्रामवासियों की जुगाली का सामान थे।

फिर स्वतंत्र भारत का एक बड़ा पुरस्कार उन लोगों को ये मिला कि उन्हें अपनी जन्मभूमि से विस्थापित होना पड़ा। वे ताम-झाम लेकर दर-दर के भिखारी हो गए। ऐसी जगह भाग जाना चाहते थे कि जहां महा-प्रलय आने तक डूब का ख़तरा न हो। ऐसे में मोरवा, बैढ़न, रेणूकूट, म्योरपुर, बभनी, चपकी आदि पहाड़ी स्थानों की तरफ वे अपना साजो-सामान लेकर भागे। अभी वे कुछ राहत की सांस लेना ही चाहते थे कि कोयला निकालने के लिए कोयला कम्पनियों ने उनसे उस जगह को खाली कराना चाहा। ताप-विद्युत कारखाना वालों ने उनसे ज़मीनें मांगी। वे बार-बार उजड़ते-बसते रहे।

कल्लू के बूढ़े दादा डूब के आतंक से आज भी भयभीत हो उठते थे। उनके दिमाग से बाढ़ और डूब के दृश्य हटाए नहीं हटते थे। हटते भी कैसे? उनके गांव को, उनकी जन्म-भूमि को, उनके पुरखों की क़ब्रगाहों-समाधियों को इस नामुराद बांध ने लील लिया था।

ये विस्थापन ऐसा था जैसे किसी बड़े जड़ जमाए पेड़ को एक जगह से उखाड़कर दूसरी जगह रोपा जाए...

क्या अब वे लोग कहीं भी जम पाएंगे?

कल्लू के दादा की आंखें पनिया जातीं जब वह अपने विस्थापन की व्यथा का ज़िक्र करते थे। जाने कितनी बार उसी एक कथा को अलग-अलग प्रसंगों पर उनके मुख से यूनुस को सुन चुका था।

दादा एक सामान्य से देहाती थे। खाली न बैठते। कभी क्यारी खोदते, कभी घास-पात उखाड़ते या फिर झाड़ू उठाकर आंगन बुहारने लगते।

दुबली-पतली काया, झुकी कमर, चेहरे पर झुर्रियों का इंद्रजाल, आंखों पर मोटे शीशे का चश्मा, बदन पर एक बंडी, लट्ठे की परधनी, कंधे पर या फिर सिर पर पड़ा एक गमछा और चलते-फिरते समय हाथों में एक लाठी।

वह बताते कि उस साल बरस बरसात इतनी अधिक हुई कि लगा इंद्र देव कुपित हो गए हों। आसमान में काले-पनीले बादलों का आतंक कहर बरसाता रहा। बादल गरजते तो पूरा इलाका थर्रा जाता।

यूनुस भी जब सिंगरौली इलाके में आया था तब पहली बार उसने बादलों की इतनी तेज़ गड़गड़ाहट सुनी थी। शहडोल ज़िले में पानी बरसता है लेकिन बादल इतनी तेज़ नहीं गड़गड़ाया करते। शहडोल जिले में बारिश अनायास नहीं होती। मानसून की अवधि में निश्चित अंतराल पर पानी बरसता है। जबकि सिंगरौली क्षेत्र में इस तरह से बारिश नहीं होती। वहां अक्सर ऐसा लगता है कि शायद इस बरस भी बारिश नहीं होगी। एक-एक कर सारे नक्षत्र निकलते जाते हैं और अचानक कोई नक्षत्र ऐसा बरसता है कि सारी सम्भावनाएं ध्वस्त हो जाती हैं। लगता है कि बादल फट पड़ेंगे। अचानक आसमान काला-अंधेरा हो जाता है। फिर बादलों की गड़गड़ाहट, बिजली की चमक के साथ ऐसी भीषण्ा बरसात होती कि लगे जल-थल बराबर हो जाएगा।

वैसे इधर-उधर से आते जाते लोगों से सूचना मिलती रहती कि पानी धीरे-धीरे फैल रहा है। लेकिन किसे पता था कि अनपरा, बीजपुर, म्योरपुर, बैढ़न, कोटा, बभनी, चपकी, बीजपुर तक पानी के विस्तार की सम्भावना होगी।

तब देश में कहां थी संचार-क्रांति? कहां था सूचना का महाविस्फोट? तब कहां था मानवाधिकार आयोग? तब कहां थीं पर्यावरण-संरक्षण की अवधारणा? तब कहां थे सर्वेक्षण करते-कराते परजीवी एन जी ओ? तब कहां थे विस्थापितों को हक़ और न्याय दिलाते कानून?

नेहरू के करिश्माई व्यक्तित्व का दौर था। देश में कांग्रेस का एकछत्र राज्य। नए-नए लोकतंत्र में बिना शिक्षित-दीक्षित हुए, ग़रीबी और भूख, बेकारी, बीमारी और अंधविश्वास से जूझते देश के अस्सी प्रतिशत ग्रामवासियों को मतदान का झुनझुना पकड़ा दिया गया। उनके उत्थान के लिए राजधानियों में एक से बढ़कर एक योजनाएं बन रही थीं। आत्म-प्रशंसा के शिलालेख लिखे जो रहे थे।

अंग्रजी राज से आतंकित भारतीय जनता ने नेहरू सरकार को पूरा अवसर दिया था कि वह स्वतंत्र भारत को स्वावलंबी और संप्रभुता सम्पन्न बनाने में मनचाहा निर्णय लें।

देश में लोकतंत्र तो था लेकिन बिना किसी सशक्त विपक्ष के।

इसीलिए एक ओर जहां बड़े-बड़े सार्वजनिक प्रतिष्ठान आकार ले रहे थे वहीं दूसरी तरफ बड़े पूंजीपतियों को पूंजी-निवेश का जुगाड़ मिल रहा था।

यानी नेहरू का समाजवादी और पूंजीवादी विकास के घालमेल का मॉडल।

आगे चलकर ऐसे कई सार्वजनिक प्रतिष्ठानों को बाद की सरकारों ने कतिपय कारणों से अपने चहेते पूंजीपतियों को कौड़ी के भाव बेचने का षडयंत्र किया।

पुराने लोग बताते हैं कि जहां आज बांध है वहां एक उन्नत नगर था। गहरवार राजा की रियासत थी। केवट लोग बताते हैं कि अभी भी उनके महल का गुम्बद दिखलाई पड़ता है।

गहरवार राजा भी होशियार नहीं थे। कहते हैं कि उनके पुरखों का गड़ा धन डूब गया है।

असल सिंगरौली तो बांध में समा चुकी है।

आज जिसे लोग सिंगरौली नाम से पुकारते हैं वह वास्तव में मोरवा है।

तभी तो जहां सिंगरौली का बस-स्टेंड है उसे स्थानीय लोग पंजरेह बाजार नाम से पुकारते हैं।

कल्लू के दादा से खूब गप्पें लड़ाया करता था यूनुस।

वे बताया करते कि जलमग्न-सिंगरौली रियासत में सभी धर्म-जाति के लोग बसते थे।

सिंगरौली रियासत धन-धान्य से परिपूर्ण थी।

तीज-त्योहार, हाट-बाज़ार और मेला-ठेला हुआ करता था। तब इस क्षेत्र में बड़ी खुशहाली थी। लोगों की आवश्यकताएं सीमित थीं। फिर कल्लू के दादा राजकपूर का एक गीत गुनगुनाते-''जादा की लालच हमको नहीं, थोड़ा से गुजारा होता है।''

मिर्ज़ापुर, बनारस, रीवा, सीधी और अम्बिकापुर से यहां के लोगों का सम्पर्क बना हुआ था।

यूनुस मुस्लिम था इसलिए एक बात वह विशेष तौर बताते कि सिंगरौली में मुहर्रम बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता था।

सभी लोग मिल-जुल कर ताजिया सजाते थे।

खूब ढोल-ताशे बजाए जाते।

तैंयक तक्कड़ धम्मक तक्कड़

सैंयक सक्कर सैंयक सक्कर

दूध मलीदा दूध मलिद्दा...

खिचड़ा बंटता, दूध-चीनी का शर्बत पिलाया जाता।

सिंगरौली के गहरवार राजा का भी मनौती ताजिया निकलता था। मुसलमानों के साथ हिन्दू भाई भी शहीदाने-कर्बला की याद में अपनी नंगी-छाती पर हथेली का प्रहार कर लयबध्द मातम करते।

'हस्सा-हुस्सैन....हस्सा-हुस्सैन'

कल्लू के दादा बताते कि उस मातम के कारण स्वयं उनकी छाती लहू-लुहान हो जाया करती थी। वह लाठी भांजने की कला के माहिर थे। ताजिया-मिलन और कर्बला ले जाने से पहले अच्छा अखाड़ा जमता था। सैकड़ों लोग आ जुटते थे। थके नहीं कि सबील-शर्बत पी लेते, खिचड़ा खा लेते। रेवड़ियों और इलाइची दाने का प्रसाद खाते-खाते अघा जाते थे।

यूनुस ने भी बचपन में एक बार दम-भर कर मातम किया था, जब वह अम्मा के साथ उमरिया का ताजिया देखने गया था। सलीम भाई तो ताजिया को मानता न था। उसके अनुसार ये जहालत की निशानी है। एक तरह का शिर्क (अल्लाह के अलावा किसी दूसरी ज़ात को पूजनीय बनाना) है। ख़ैर, ताजिया की प्रतीकात्मक पूजा ही तो करते हैं मुजाविर वगैरा...

यूनुस ने सोचा कि अगर लोग उस ताजिया को सिर झुका कर नमन करते हैं तो कहां मना करते हैं मुजाविर! उनका तो धन्धा चलना चाहिए। उनका ईमान तो चढ़ौती में मिलने वाली रक़म, फ़ातिहा के लिए आई सामग्री और लोगों की भावनाओं का व्यवसायिक उपयोग करना ही तो होता है। साल भर इस परब का वे बेसब्री से इंतज़ार करते हैं। हिन्दू-मुसलमान सभी मुहर्रम के ताजिए के लिए चंदा देते हैं।

उमरिया में तो एक से बढ़कर एक खूबसूरत ताजिया बनाए जाते हैं। लाखों की भीड़ जमा होती है। औरतों और मर्दों का हुजूम। खूब खेल-तमाशे हुआ करते हैं। जैसे-जैसे रात घिरती जाती है, मातम और मर्सिया का परब अपना रंग जमाता जाता है। कई हिन्दू भाईयों पर सवारी आती है। लोग अंगुलियों के बीच ब्लेड के टुकड़े दबा कर नंगी छातियों पर प्रहार करते हैं, जिससे जिस्म लहू-लुहान हो जाता है।

ईरानी लोग जो चाकू-छूरी, चश्मा आदि की फेरी लगाकर बेचा करते हैं, उनका मातम देख तो दिल दहल जाता है। वे लोग लोहे की ज़जीरों पर कांटे लगा कर अपने जिस्म पर प्रहार कर मातम करते हैं।

कुछ लोग शेर बनते हैं।

शेर का नाच यूनुस को बहुत पसंद आया था।

रंग-बिरंगी पन्नियों और काग़ज़ों की कतरनों से सुसज्जित ताजिया के नीचे से लोग पार होते। हिन्दू और मुस्लिम औरतें, बच्चे और आदमी सभी बड़ी अक़ीदत के साथ ताजिया के नीचे से निकलते।

यूनुस ने देखा था कि एक जगह एक महिला ताजिया के सामने अपने बाल छितराए झूम रही है। कभी-कभी वह चीख़-चीख़ कर रोने भी लगती है। उसकी साड़ी मैली-कुचैली हो चुकी है। जब वह अपनी छाती पर हाथ मार-मार कर रोती तो लगता कि जैसे उसके घर में किसी की मौत हो गई हो।

नन्हा यूनुस उस औरत के रोने से भयभीत हो गया था।

डूब में बसे कस्बे में मुहर्रम के मनाए जाने का कुछ ऐसा ही दृश्य कल्लू के दादा बताया करते थे।

लोगों का जीवन खुशहाल था।

रबी और खरीफ़ की अच्छी खेती हुआ करती थी।

उस इलाके की खुशहाली पर अचानक ग्रहण लग गया।

लोगों ने सुना कि अब ये इलाका जलमग्न हो जाएगा।

किसी ने उस बात पर विश्वास नहीं किया।

सरकारी मुनादी हुई तो बड़े-बुज़ुर्गों ने बात को हंस कर भुला दिया। अभी तो देश आज़ाद हुआ है। अंग्रेज भी ऐसा काम न करते, जैसा आजाद भारत के कर्णधार करने वाले थे।

इस बात पर कौन यकीन कर सकता था कि गांव के गांव, घर-बार, कार्य-व्यापार, देव-स्थल, मस्जिदें, क़ब्रगाहें सब जलमग्न हो जाएंगी। और तो और गहरवार राजा का महल भी डूब जाएगा।

उत्तर-प्रदेश और मध्य-प्रदेश की सीमा पर बसा सिंगरौली क्षेत्र। उस क्षेत्र के लोगों की चिन्ता उत्तर-प्रदेश की सरकार को थी और न मध्य-प्रदेश की सरकार को।

रेणूकूट में बांध बन कर तैयार हो चुका था। धीरे-धीरे पानी का स्तर बढ़ रहा था। सरकारें खामोशी से डूब की प्रतीक्षा कर रही थीं। स्थानीय लोग ये मानने को मानसिक रूप से तैयार न थे कि अंग्रेजों के जाने के बाद एक ऐसा समय भी आएगा जब उन्हें अपने पूर्वजों की समाधियों को, अपने कुल-देवताओं को, अपनी जन्म-भूमि को छोड़ना पड़ेगा। अपनी मातृभूमि से उन्हें बेदखल होना पड़ेगा। विस्थापन का दंश झेलना पड़ेगा।

लोगों को कहां मालूम था कि देश के एक बड़े उद्योगपति बिड़ला की इच्छा है कि उन्हें एल्यूमिनियम बनाने का एशिया-प्रसिध्द प्लांट यहीं डालना है, क्योंकि ये एक पिछड़ा इलाका है। यहां किसी तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होगा। किसी तरह की कोई प्रशासनिक अड़चनों का सामना नहीं करना होगा। कम से कम लागत पर अत्यधिक लाभ का अवसर वहां था।

हवाई जहाज द्वारा इस इलाके की प्राकृतिक सम्पदा का आंकलन हो चुका था।

बिड़ला द्वारा लाखों एकड़ की वन-भूमि पर क़ब्ज़ा हो चुका था। प्लांट के लिए उपकरण आयात किए जा रहे थे।

आधुनिक युग के तीर्थ उद्योग-धन्धे होंगे, नेहरू का नया मुहावरा देश की फ़िज़ा में गूंज रहा था।

नेहरू की तिलस्मी छवि के आगे देश में कोई प्रतिद्वंदी न था।

गांधी-नेहरू मित्र बिड़ला को अपने भावी उद्योग के लिए चाहिए थी सस्ती ज़मीन, आयातित उपकरण और पर्याप्त मात्रा में बिजली।

बिजली के लिए ज़रूरी था पानी और कोयला।

पानी के लिए तो नेहरू बनवा ही रहे थे बांध और ईंधन के लिए सिंगरौली क्षेत्र में था कोयले का अकूत भण्डार।

सिंगरौली क्षेत्र में है एशिया की सबसे मोटी कोयला परतों में से एक परत 'झिंगुरदह सीम'। जो कि लगभग एक सौ पचास मीटर मोटी है।

झिंगुरदह खदान से कोयला 'एरियल रोप-वे' द्वारा बिड़ला के पावर प्लांट 'रेणूसागर' में आता। रेणूसागर में ताप-विद्युत तकनीकी से बिजली बनती जिसे सीधे रेणूकूट में स्थित एल्यूमिनियम कारखाने में भेजा जाता था।

कोयला उद्योग का जब इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय-करण किया तभी से सिंगरौली कोयला क्षेत्र में सुव्यवस्थित कोयला उत्पादन की योजनाएं बनीं। बांध के इर्द-गिर्द मध्य-प्रदेश, उत्तर-प्रदेश की राज्य सरकारों ने और एनटीपीसी ने अपने ताप-विद्युत केंद्र स्थापित किए।

एक समय था जब दादा-पुरखे किसी को शाप देते तो यही कहते थे-'जा बैढ़न को...'

आज वही अभिशप्त बैढ़न नव-उद्यमियों, तकनीशियनों, पूंजीपतियों, पब्लिक स्कूलों, गैर सरकारी संगठनों, धार्मिक-आध्यात्मिक व्यवसायियों आदि के लिए स्वर्ग बना हुआ है।

एक से एक सर्वसुविधायुक्त नए-नए नगर स्थापित हो रहे हैं। बैढ़न में ज़मीन की कीमतें आकाश छू रही हैं।

आज सिंगरौली एक ऊर्जा-तीर्थ के रूप में याद किया जाता है।

कल्लू के गांव के नीचे एक नाला बहता था। दर्रा-नाला। खदान से निकला पानी और कालोनी का निकासी पानी नाले में साल भर बहता। दर्रा-नाले के इर्द-गिर्द एक बस्ती आबाद हो गई 777थी। यह ठेकेदारी मज़दूरों की बस्ती थी। इस आबादी का नाम सफेदपाश लोगों ने आजाद-नगर नाम दिया था।

आजाद-नगर नाम के अनुसार ये बस्ती भारतीय दंड विधान की धाराओं, उपधाराओं आदि पाबंदियों से आजाद थी। इस बस्ती को समस्त वर्जनाओं से आजादी मिली हुई थी। आजाद नगर में प्रचुरता से उपलब्ध था--शराब, शबाब, कबाब, जरायम-पेशा लोग, भूख-बीमारी-बेकारी और सट्टा-जुआ के अड्डे।

सभ्य-जन इधर का रूख न करते, वे उसे पाप-नगरी कहते। रावण की लंका और नर्क का द्वार कहते।

इस नर्क के निवासी थे तमाम मेहनतकश....

ये मेहनत-कश कार्ल-माक्र्स के देसी संस्करण वाले तमाम मजदूर संगठनों की निगाह से उपेक्षित थे। उनकी खुशहाली के लिए उन मज़दूर संगठनों के पास कोई कार्यक्रम न था। उन लोगों के लिए कोई मानवाधिकार आयोग न था। कोई टाउन-प्लानिंग कमेटी न थी। कोई अस्पताल, कोई नर्सिंग होम न था। उनके लिए कोई रिक्शा-स्टेंड या बस-अड्डा न था। उनके बच्चों के लिए कोई स्कूल न था। उनके लिए किसी तरह की औपचारिक या अनौपचारिक शिक्षा की कोई व्यवस्था न थी।

उनकी आध्यात्मिक उन्नति के लिए कोई मौलवी, पंडित या पादरी न था।

उनमें ज्यादातर लोग कोयले के ढेर से पत्थर-शैल छांट कर अलग करने वाले मज़दूर थे। खदान चलाने के लिए भवन, नगर, सड़कें और विशालकाय वर्कशाप आदि निर्माण के काम में नियोजित सैकड़ों रेजा मजदूर और मिस्त्री। विद्युत, यांत्रिकीय, सिविल आदि काम के लिए कुशल-अकुशल ठेकेदारी कामगार। मेहनत-मशक्कत, नैन-मटक्का से लेकर गाने-बजाने तक में कुशल युवतियां।

आजाद नगर में कुछ छोटे-मोटे ठेकेदारों ने भी अपने आशियाने सजाए हुए थे।

पुलिस थाने के रिकार्ड में ये बस्ती तमाम अपराधों की जन्मदाता के नाम से मशहूर थी। इसलिए पुलिस यहां अक्सर दबिश करती और प्रकरण बनाया करती, लेकिन गलत काम पूरी तरह से बंद नहीं करवाती। लोग कहते कि यदि आजाद नगर सुधर गया या उजड़ गया तो फिर पुलिस विभाग की कमाई बंद हो जाएगी।

कल्लू आजाद नगर के उस हिस्से का नियमित ग्राहक था, जहां दारू और रूप का सौदा होता था।

ऐसे ही गप्प के दौरान यूनुस ने एक किशोरी के बारे में जानना चाहा, जो साइकिल पर दनदनाती फिरती है। लोग कहते हैं कि वह थानेदार और एक बड़े ठेकेदार की रखैल है।

कल्लू ने यूनुस की तरफ अविश्वास से देखा--''का गुरू, तुम भी इस चक्कर में रहते हो?''

यूनुस क्या जवाब देता-''तो का, मैं आदमी नहीं हूं क्या?''

बस, फिर क्या था।

कल्लू एक दिन यूनुस को आजाद नगर ले गया।

पहले तो यूनुस ने ना-नुकुर की। उसे डर था कि कहीं ये बात खालू या खाला तक न पहुंचे। उसकी गत बन जाएगी। यदि सनूबर उसकी ये हरकत जान गई तो जिन्दगी भर माफ न करेगी। उसे कितना प्यार करती है सनूबर।

अरे, जब सनूबर की चचेरी बहन जमीला ने यूनुस को अपने हुस्न के जाल में फंसाना चाहा था तो सनूबर ने ही उसे बचाया था।

जमीला यूनुस से चार-पांच साल बड़ी होगी। वह विवाहित थी। उस समय उसके बच्चा न हुआ था। एकदम पके आम की तरह गदराई हुई थी।

जमीला मैके आई तो खाला से मिलने चली आई। जमीला का शौहर खाड़ी देश कमाने गया था। जमीला के पास पैसे तो इफ़रात थे। इसीलिए वह दिल खोल कर खर्च करती थी। ऐसे मेहमान किसे बुरे लग सकते हैं।

जमीला की खाला से खूब पटती। वे जब भी मिलतीं, जाने क्या बातें करके खूब हंसतीं, ज्यों बचपन की बिछड़ी पक्की सहेली हों।

जमीला की नाक में पड़ी सोने की लौंग में एक नग गड़ा था। रोशनी पड़ने पर वह खूब चमकता। उसकी चमक से जमीला की आंखें दमकने लगतीं। यूनुस जब भी जमीला की तरफ देखता, उसकी नाक की लौंग की चमक के तिलस्म में उलझ कर रह जाता।

शायद इस बात से जमीला वाकिफ़ थी।

यूनुस ने महसूस किया कि जमीला उसकी तरफ कुछ अधिक झुकाव रखती है। ऐसा पहले न था। अब शायद यूनुस किशोरावस्था से जवानी की ओर तेज़ी से क़दम बढ़ा रहा था। काम-धंधा करने से उसके जिस्म में ग़ज़ब की कशिश आ गई थी। था भी यूनुस पांच फिट सात इंच का गबरू जवान। हल्की-हल्की मूंछ और बाल संजय दत्त जैसे। यूनुस संजय दत्त का फैन था।

यूनुस नाईट-शिफ्ट खटके घर लौटा तो घड़ी में सुबह के दस बज रहे थे। रात पाली में पेलोडर चलाने के बाद यदि गाड़ी में कुछ खराबी आ जाए तो उसे वर्कशॉप लाकर खड़ा करना होता था। फिर गाड़ी में जो भी ब्रेक-डाउन हो उसे मेकेनिक को बतलाकर मरम्मत करवाना रात-पाली के आपरेटर का काम था। वहां का सुपरवाईज़र एक मद्रासी था। बहुत कानून बतियाता था।

'अइसा करने का' 'वइसा करने का' या 'बोले तो नई सुनता का?'

यूनुस मद्रासी को रत्ती-भर भाव न देता। इस कारण मद्रासी सुपरवाईज़र से उसे अवांछित लाभ भी न मिल पाता।

सो काम पूरा होने के बाद भी घर पहुंचने में उसे देर हो ही जाती।

जब वह घर पहुंचा उस समय खालू डयूटी गए हुए थे। खाला कहीं पड़ोस में गपियाने गई थीं। गोद के बच्चे छोड़कर पढ़ने वाले सभी बच्चे स्कूल जा चुके थे।

यूनुस ने दरवाजा ढकेला तो वह खुल गया।

सन्नाटा देख वह बैठकी में रखे तखत पर बैठ गया कि आहट सुनकर कोई बोलेगा। हो सकता है कि खाला गुसलखाने में हों।

लेकिन कुछ देर तक कोई खट-पट नहीं हुई तो वह उठा। रसोई से होकर आंगन की तरफ गया। आंगन में पानी की टंकी थी, जहां परिवार के मर्द या फिर बच्चे नहाते-धोते थे।

हाथ-मुंह धोने वह टंकी के पास जा पहुंचा।

अभी वहां पहुंच कहां पाया था कि उसने जो दृश्य देखा तो उसके होश उड़ गए।

जमीला टंकी के पीछे खड़े-खड़े नहा रही थी।

उसकी कमर से ऊपर का हिस्सा खुला हुआ था।

सांवला जवान जिस्म....

सांचे में ढला बदन.....

यूनुस उल्टे पांव भागना चाहा, लेकिन तभी उसकी नाक की लौंग का नग चमचमाने लगा। उसकी चमक से निकली किरनों की रस्सी से यूनुस के पांव बंध से गए थे।

आहट पाकर जमीला एकबारगी चौंकी, फिर खिलखिलाकर हंस पड़ी। उसने अपने जिस्म को छुपाया नहीं बल्कि दो मग पानी और जिस्म पर डाल लिया।

यूनुस के होश उड़ गए।

उसने जाना कि जमीला की हंसी में खुला आमंत्रण था।

जमीला एक चैलेंज की तरह उससे टकराई थी।

घबराहट में यूनुस घर से निकल भागा, वह रूका नहीं।

वह तब तक न लौटा जब तक उसे विश्वास न हो गया कि अब घर में खाला और बच्चे आ गए होंगे।

दोपहर में जब वह आंगन में खटिया डाले धूप में सो रहा था, कि उसे लगा उसके ऊपर कोई सोया हुआ है। वह जमीला थी, जो मौका पाकर यूनुस को छेड़ रही थी।

जमीला की छातियां उसकी छाती से आ लगी थीं।

यूनुस की सांस अटकने लगी।

जमीला के होंठ यूनुस के चेहरे पर अपना कमाल दिखाने लगे।

जमीला उसके कान में फुसफुसा कर गा रही थी-

''धीरे धीरे प्यार को बढ़ाना है

हद से गुज़र जाना है....''

क्या यूनुस को उस समय तक 'हद से गुज़र जाने' का मतलब पता चल पाया था?

ऐसा नहीं कि यूनुस कोई संत था लेकिन वह तब सनूबर की आंखों की झील में डुबकियां लगा रहा था। सनूबर के पल्टे हुए होंठ जब मुस्कुराते तो जैसे यूनुस के जेब खनखनाने लगती। यूनुस एकाएक अमीर आदमी में बदल जाता था। उसे लगता कि इस संसार में एक वही 'धनवान' है, और बाकी सब मर्द 'कंगाल' हो गए हैं।

उसे सनूबर छोड़ और कोई दूसरी लड़की कैसे प्यारी होती ?

एक दिन उसने सनूबर से जमीला की हरकतों के बारे में बताया तो सनूबर खूब हंसी। उसने यूनुस को चिढ़ाया कि वह कैसा मर्द-बच्चा है। यहां तक कि सनूबर ने जमीला के साथ मिलकर उसकी हंसी भी उड़ाई थी।

यूनुस अपने प्यार के साथ बेवफ़ाई नहीं करना चाहता था।

इस घटना के बाद उसने अपने लिए सनूबर के दिल में और ज्यादा जगह बना ली थी।

चार

यूनुस कोई बाल-ब्रह्मचारी न था और न ही सदाचार के लिए कृत-संकल्पित युवक।

वह अपने आसपास के अन्य सैकड़ों किशोरों और युवाओं की तरह अपनी शारीरिक क्षमताओं और कमज़ारियों के प्रति आशंकित रहता था। उसके मन में सहज जिज्ञासा थी कि इंसान के जीवन का ये कैसा अध्याय है, जिसके प्रति सयाने-बुजुर्ग इतनी घृणा का प्रदर्शन करते हैं। क्या वे वाकई इन गोपन-क्रियाओं के प्रति अनासक्त होते हैं? नहीं, बल्कि इस अनूठी-प्राकृतिक क्रिया में वे आकंठ डूबे होते हैं।

यूनुस एक ऐसे निम्न-मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवार में पैदा हुआ था, जहां दो कमरे में पूरी गृहस्थी समाई हुई थी।

जहां माता-पिता के बीच प्रेम और घृणा प्रकट करने के लिए कोई पृथक व्यवस्था न थी।

जहां हर दो-चार साल के अंतराल में एक संतान का जन्म लेना साधारण घटना थी।

जहां बड़े-बुजुर्ग, बच्चों के सामने मुहल्ले के लोगों से खुलकर हंसी-ठिठोली करते थे।

जहां स्त्रियां आपस में गोपन रहस्यों पर इशारतन बतिया कर अवर्णनीय आनंद उठाया करतीं।

इन ठिठोलियों में देवर-भौजाई के रिश्ते से उपजी अश्लील शब्दावली आम थी।

बच्चे जान जाते थे कि जब सड़ा केला-पिलपिला पपीता कहा जाता है तो उसका भावार्थ क्या होता है ?

जब गहरा कुंआ और छोटी रस्सी की बात करके बड़े हंस रहे हैं तो उसका अर्थ क्या हो सकता है?

जब खलबट्टा से मसाला कुटाई की बात होती है तो मार कहां होती है।

परिणामत: उन परिवारों की बेटियां असमय युवा होकर नैन-मटक्का करते-करते घर से भाग जाती है या फिर बिन-ब्याही मां बन जाती है।

उन परिवारों के लड़के बुआ-मौसी, चाची-काकी, अविवाहित दीदियों या फिर घरेलू नौकरानियों के संपर्क में आकर युवा अनुभवों का पाठ पढ़ते हैं।

इसीलिए यूनुस के, बचपन से जवानी तक के अध्याय निर्दोष न थे।

बीना कोयला खदान में काम के दौरान कल्लू यूनुस का अंतरंग मित्र बन गया।

कल्लू बाल-बच्चेदार किन्तु बहुत लापरवाह किस्म का युवक था। यूनुस ने उसकी बीवी को देखा था। वह मुटा कर भैंस हो गई थी।

कल्लू की मौसी दिखती थी वो।

कल्लू के लिए तीन लड़कियां और एक लड़का जन चुकी थी वो।

अगर सारे बच्चे जिन्दा होते तो अब तक वह पांच बार मां बन चुकी थी। एक बार गर्भपात हुआ था। अब उसके जिस्म में रस न था। बच्चों को पाल ले, कल्लू को बस इतनी ही चाह थी उससे।

कल्लू इसीलिए इधर-उधर मुंह मारा करता।

कल्लू ने यूनुस को भी 'स्वाद चखने' का न्योता दिया।

वह कहा करता-''तुम अपने अल्ला के पास जाओगे, तो अल्ला पूछेगा, धरती में क्या किया? जब तुम बताओगे कि न मैंने दारू पी, न जेल गया, न रंडीबाजी की तो अल्ला बड़ी जोर से हंसेगा और तेरी गांड़ पर दो किक जमा कर इस दुनिया में दुबारा भेज देगा कि बच्चू जब कुछ किया ही नहीं फिर यहां कैसे आ गए।''

इसी तरह की बातें करके वह यूनुस को अपने पक्ष में तैयार करता।

और एक दिन यूनुस तैयार हो ही गया।

उसने कल्लू के प्रस्ताव को एक चैलेंज माना।

हालांकि उसका अंतर्मन इस बात के लिए तैयार न था।

कल्लू उसे आजाद नगर के उस हिस्से में ले गया जहां जिस्म-फरोशी होती थी।

झोंपड़ियों की कतारें। बीच में गली। ठेले पर चना, मूंगफली, नमकीन और अंडे की दुकानें। कुछ पान की गुमटियां। चाय-समोसे के लिए होटल एक झोपड़ी में।

माहौल में अजीब तरह की सड़ांध। जैसे कहीं कोई जानवर मरा हो। हवा में हल्की सी नमी व्याप्त थी। बारिश का मौसम खत्म हुआ था और शरद का आगमन हो चुका था। सायंकालीन आकाश का रंग हल्का लाल, पीली और नीला था। सारे रंग धीरे-धीरे धुंधलाते जा रहे थे। लगता था कि जल्द ही आसमान पर सुरमई रंगत छा जाएगी।

कामगार काम से छूटकर घर लौट रहे थे।

झोपड़ियों के दरवाज़े खुलने लगे थे।

मर्द घर के बाहर खाट डाल कर बैठने लगे थे। गांजा-चिलम का दौर शुरू हो रहा था। दारू पीने वाले मजदूर बन-ठन कर भट्टी की ओर जा रहे थे।

झोपड़ियों में अब चूल्हे सुलगाने का उपक्रम होने लगा। मज़दूर अमूमन काम से लौट आए थे। दर्रा नाले में नहाकर औरतें, मर्द और बच्चे लौट रहे थे।

दर्रा नाला एक बदनाम जगह का पर्याय बन चुका था।

लोग जानते थे कि यहां सुबह से शाम तक मजदूर स्त्री-पुरूषों के नहाने का कार्यक्रम निर्विध्न चला करता है।

बीना-वासी दर्रा-नाले को 'वैतरणी' का नाम देते या फिर उसे 'राम तेरी गंगा मैली' कहते। कॉलोनी के बदमाश लड़के स्कूल से भागकर दर्रा नाला के आसपास मंडराते रहते और छुप-छुप कर नहाती स्त्रियों को देखा करते।

यूनुस सहमा-सहमा आजाद-नगर के माहौल का जायज़ा ले रहा था। उसके मन में भय था कि कहीं खालू का कोई साथी उसे यहां देख न ले, वरना शामत आ जाएगी।

वैसे भी यूनुस का खालू से छत्तीस का आंकड़ा था। खालू उसे फूटी आंख पसंद न करते।

कल्लू यूनुस का हाथ थामे एक झोंपड़ी के सामने रूका।

यह निचली छानी वाली एक मामूली सी झोपड़ी थी। बाहर परछी थी। परछी में एक खाट बिछी थी। कल्लू ने यूनुस को परछी में खाट पर बैठने का इशारा किया। फिर वह अंदर चला गया।

यूनुस खाट पर बैठा ही था कि दो नंग-धड़ंग बच्चे उसके पास चले आए-''मालिक चना खाने को पैसा दो ना!''

यूनुस ने उन्हें फटकारा।

वे टरे नहीं, ज़िद पर अड़े रहे।

तब तक कल्लू झोंपड़ी से बाहर निकला। उसने यूनुस को परेशान करते बच्चों की पीठ पर धौल जमाई। बच्चे तुरंत रफूचक्कर हो गए।

कल्लू ने यूनुस से फुसफुसाकर कहा-''पहले तुम जाओ, समझे।''

यूनुस क्या कहता, उसे तो अनुभव लेना था। उसने 'हां' में सिर हिला दिया।

उसके दिल की धड़कनें तेज़ हो चुकी थीं। उसने अपने सीने में हाथ रखा। दिल बड़ी तेज़ी से धड़क रहा था। माथे पर पसीना चुचुआने लगा था।

हिम्मत करके वह खटिया से उठा।

कल्लू उसकी जगह खाट पर बैठ गया।

यूनुस झिझकते-झिझकते झोपड़ी के दरवाज़े के पास जाकर खड़ा हुआ।

वह टीना-टप्पर ठोंक-ठांक कर बनाया गया एक काम-चलाऊ दरवाजा था। उसने कल्लू की तरफ देखा।

कल्लू ने आंख के इशारे से बताया कि दरवाजा ठेलकर वह घुस जाए।

यूनुस ने दरवाजे को धक्का दिया। दरवाजा खुल गया।

अंदर लालटेन की मध्दम रोशनी थी।

वह अंदर पहुंचा तो उसने देखा कि कोने में एक चारपाई है और जमीन पर भी बिस्तर बिछा है।

जमीन के बिस्तर पर एक अधेड़ महिला बैठी है। ठीक उसकी खाला की उम्र की महिला। उसने सिर्फ लहंगा और ब्लाउज़ पहन रखा है। वह एक छोटे से आईने को एक हाथ से पकड़े अपने होठों पर लिपिस्टिक लगा रही है।

यूनुस को देखकर उसने उसे खटिया पर बैठने का इशारा किया।

यूनुस का मन वितृष्णा से भर उठा।

उसकी रंगत सांवली थी जो लालटेन की मध्दम रोशनी में काली नज़र आ रही थी।

महिला ने उसे एक बार फिर गौर से देखा और हंसी। यूनुस ने देखा कि उसके सामने के दो दांत टूटे हैं।

लालटेन की धुंधली रोशनी में उसका हंसता चेहरा किसी चुड़ैल की तरह नज़र आया।

यूनुस को उबकाई आने लगी।

अभी तक उसने कोठा देखा था तो सिर्फ सिनेमा में। जहां वेश्याओं का रोल नामी-गिरामी हीरोइनें किया करती हैं। रेखा, माधुरी दीक्षित, तब्बू, करिश्मा कपूर, रवीना आदि हीरोइनें जब वेश्याएं बनती हैं तों कितनी खूबसूरत दिखा करती हैं। एक से बढ़कर एक हीरो इन वेश्याओं के दीवाने होते हैं। अरे, 'मंडी' पिक्चर में भी वेश्याएं कितनी खूबसूरत थीं।

आजाद-नगर में तो सारा हिसाब ही उल्टा-पुल्टा है।

महिला यूनुस के पास आकर खाट पर बैठ गई।

उसने ब्लाउज़ के बटन खोलते हुए कहा-'देरी नहीं, जल्दी करो। बोत काम है। जादा टैम नहीं लेना।''

ब्लाउज़ के बटन खुले और..... यूनुस को काटो तो खून नहीं।

वह तब तक बेहद घबरा चुका था।

अभ्यस्त महिला जान गई कि बालक नर्वस है। उसने यूनुस का हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचा।

यूनुस ने उसके हाथ की सख्ती महसूस की। वह एक खुरदुरा-पथरीला हाथ था।

यूनुस की रही-सही ताकत जवाब दे गई।

उसने महिला से हाथ छुड़ाया और उठते हुए बस इतना ही कहा-''थोड़ा बाहर से होकर आता हूं।''

और बिना देर किए कमरे से बाहर निकल आया।

कल्लू ने सवालिया निगाहों से उसे देखा और फुसफुसाया-''बड़ी जल्दी झड़ गया बे!''

यूनुस ने इशारे में बताया-''हां!''

फिर जब कल्लू सीना फुलाकर कमरे के अंदर घुसा तो यूनुस तत्काल उस आजाद-नगरी से नौ-दो ग्यारह हो गया।

उसके बाद उसने कल्लू की दोस्ती भी छोड़ दी थी।

पांच

चाय कब खत्म हुई, वह जान न पाया।

एक रूपए की एक कप चाय वह पी चुका था और उसे उस चाय की तासीर का इल्म भी न हुआ।

यूनुस को सनूबर 'चहेड़ी' कहती।

खालू चाय के दुश्मन हैं। चाय को खालू ज़हर कहा करते। खाला चाय की बेहद शौकीन थीं। खाला के घर के अजीब हालात थे। खालू जिस चीज़ के खिलाफ़ होते, खाला उस काम को धड़ल्ले से करतीं। खालू बड़बड़ाते तो खाला तिरस्कार से हंसतीं।

यूनुस का मन उस एक कप चाय से न भरा।

उसने होटल वाली से एक और कप चाय के लिए कहा।

केतली में चाय बची थी।

महिला उसे कप में ढालने लगी तो यूनुस ने उसे टोका-''ठंडा गई होगी। तनि गरमा लेई।''

केतली की चाय को महिला ने भट्टी पर गरमाया।

फिर उसके लिए चाय कप में न ढाल कर कांच के गिलास में ढाली।

यूनुस ने देखा कि चाय की मात्रा एक कप से ज्यादा है।

गिलास देते वक्त यूनुस ने महसूस किया कि महिला ने अपनी अंगुलियों का स्पर्श होने दिया है। वह मुस्कुराया।

इस बार की चाय ने उसे तृप्त किया।

उसने सोचा अब सिंगरौली स्टेशन की ठंड उसका बाल बांका नहीं कर सकती।

चाय के पैसे देने लगा तो छुट्टा वापस करते हुए पूछा-''कहां तक जाना है?''

यूनुस क्या बताता। हर बार तो वह ऐसे ही निकल पड़ता है, मंज़िल के बारे में जाने बिना। इस बार भी वह एक अंधी छलांग लगा रहा है। हां, ये ज़रूर है कि इस बार, ये छलांग वह बिना बैसाखी के लगाएगा। वह अपने पैरों से खुद ही दौड़ लगाएगा, जिस तरह लम्बी कूद से पहले धावक दौड़ता है। अब उसके दिमाग में किसी भी प्रकार की दुविधा नहीं है। वह इत्मीनान से उस निशान को देखेगा जिस पर पैर छुआकर कूदना पड़ता है। फिर एक लम्बा सांस भरकर वह पूरे आत्मविश्वास के साथ छलांग लगाएगा। अब ये उछाल कितनी लम्बी होगी ये तो वक्त ही बताएगा। उसे डर था कि कहीं ज़िन्दगी के मैदान में, वक्त क़ा बूढ़ा रेफ़री उसकी छलांग को 'फाऊल' न करार दे दे।

छुट्टा जेब के अंदर डालते हुए उसने महिला के प्रश्न का सहज उत्तर दिया-''कटनी!''

सच भी है।

पहले तो उसे कटनी ही जाना है।

उसके बाद ही आगे की गाड़ी पकड़नी होगी।

वह वापस स्टेशन लौट आया।

प्लेटफार्म पर रनिंग-स्टाफ रूम के बाहर जलाई गई आग के पास ही उसने खड़ा होना उचित समझा।

स्टाफ अब बतिया नहीं रहे थे। लगता है गप्पें मारते-मारते वे थक गए होंगे। अब वे ऊंघ रहे थे। उनके नीले ओवरकोट फर्श पर लिथड़ा रहे थे। उन्हें नींद सता रही थी।

यूनुस एक पेटी पर बैठ गया, जिसके साईड में लिखा था-''ए बी दास, गार्ड'

आंच में अब जान नहीं थी।

नया कोयला डालने पर ही कुछ ताप बढ़ता।

यूनुस ने स्वेटर के ऊपर विन्ड-शीटर पहन रखा था।

घर से निकला तब रात के नौ बजे थे। वातावरण काफी ठंडा हो गया था।

उसे हाथ और कानों में अधिक ठंड लगती थी।

बीना से औड़ी-मोड़ तक तो वह बस से आ गया। फिर औड़ी-मोड़ में उसे अगले साधन के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ी। सिंगरौली के लिए बनारस से बस आती है।

औड़ी-मोड़ इस इलाके की सबसे ठंडी जगह है।

उसे बस का बेसब्री से इंतजार था। वह चाहता था कि जल्दी से जल्दी खालू की पहुंच से दूर निकल जाए। कहीं उनका कोई साथी उसे यहां सफर करते रंगे-हाथ पकड़ न ले।

इसीलिए वह आर टी ओ चेक-पोस्ट के पास जाकर खड़ा हो गया। यहां बस रूकती है।

बस आई तो उसे कुछ राहत मिली।

यह उत्तर-प्रदेश राज्य परिवहन निगम की बस थी।

लगता है राबर्टसगंज डीपो की बस थी। तभी तो एकदम खड़खड़ा रही थी।

बस अंदर ठंड से बचने का सवाल न था। खिड़कियों के शीशे गायब थे। जिन खिड़कियों में शीशे थे भी तो वे ढंग से बंद न होते। पूरे बस में ठंडी हवा के तीर चल रहे थे।

यूनुस के हाथ और कान ठंडाने लगे और उसे सनूबर की याद हो आई।

उसने तत्काल अपने विंड-शीटर के जेब की तलाशी ली।

वाकई, सनूबर के दिल में उसके लिए एक कोना सुरक्षित है। वह अपना कर्तव्य भूली न थी। विंड-शीटर के एक जेब में सनूबर के हाथों से बुना दस्ताना था, और दूसरे में मफ़लर।

उसने दास्ताने पहने और जब मफलर से कान लपेटे तो लगा कि सनूबर अदृश्य रूप में उसकी हमसफ़र है।

यूनुस भाग रहा था।

वह भाग रहा था, बहुत कुछ पाने के लिए और खो रहा था सनूबर को।

क्या ये सच नहीं है कि सनूबर की वजह से वह जिन्दा है। उसने ही यूनुस के दिल में ज़िन्दगी के चैलेंज को स्वीकार करने की इच्छा जगाई है।

सनूबर ने ही उसकी अंतरात्मा को ललकारा था कि यूनुस जागो! दुनिया में कुछ कर दिखाना है तो समाज में पहले अपनी 'कुछ हटके' पहचान बनाओ!

वरना एक समय तो वह इतना हताश हो गया था कि उसे जीवन से मोह नहीं रह गया था। उसे ऐसा लगता था कि इतनी कम उम्र में इतने अपमान, इतने दुख उठाने से अच्छा है कि वह आत्महत्या कर ले।

वह दोस्तों के बीच और कभी-कभी खाला के सामने अक्सर कहता भी था कि जी करता है मर जाऊं तो मुक्ति मिले।

मुक्ति...

लेकिन किससे ?

जीवन से या कि दिन-प्रतिदिन के उलाहनों-तानों से ?

लेकिन जीवन उसे सनूबर के रूप में अपने पास बुलाता-''तुम मेरे हो। तुम्हें मेरी खातिर जीवित रहना है।''

जाने कैसे सनूबर इतनी संजीदा बातें बोलना सीख गई है।

स्कूल जाती है न!

सहेलियों के बीच उठती-बैठती है।

घर में 'ब्लेक एण्ड व्हाइट' टीवी है। उसका चैनल बदल-बदल कर हिन्दी फिल्मों और धारावाहिकों से यही सब तो सीखते हैं कॉलोनी के बच्चे।

एक और डायलाग जो यूनुस को अच्छा लगता-''मैं तुम्हारा इंतेज़ार करूंगी! तुम्हें मेरी खातिर आना होगा यूनुस...''

वो मुहम्मद रफ़ी का गाया एक गाना है ना-

''हम इंतेज़ार करेंगें तिरा क़यामत तक

खुदा करे कि क़यामत हो और तू आए।''

सनूबर की आंखें बड़ी-बड़ी हैं।

जब वह भावनाओं कि बहाव में डूब-उतरा रही हों तब आंखें अधखुली रहतीं।

खोई-खोई सी, शून्य में ताकती आंखें।

सनूबर अभी कक्षा आठ की छात्रा ही तो है।

चौदह साल की उम्र में इतनी बड़ी बात...

'मेरी खातिर' और 'मैं तुम्हारा इंतेज़ार करूंगी!'

प्रेमातिरेक में डूबी भावुक बातें!

सनूबर कई बातों में अपने खानदान से कुछ हट के नज़र आती।

गोरी-चिट्टी सनूबर वाकई अपने भाई-बहनों के बीच अलग दीखती। उसके नैन-नक्श अपनी मां पर हैं। गोलाकार चेहरा, संतुलित बनावट, माथा कम चौड़ा और लम्बे बाल।

खालू की परछाईं भी नहीं पड़ी ज़रा सी।

यदि वह खालू या उनके खानदान के किसी का साया पड़ा होता तो उसकी बड़ी-बड़ी आंखों की जगह अंदर की ओर धंसी हुई गोल कटोरियां होतीं।

पतले होंठों की जगह खालू की तरह मोटे और ऊपर की तरफ़ पल्टे हुए बेढंगे से होंठ होते।

सनूबर खाला-खालू की पहली संतान थी।

खालू भारतीय सेना की नौकरी पर थे तब सनूबर का जन्म हुआ था।

सैनिकों के बीच वयस्क मज़ाक हुआ करते। यदि सैनिक यूपी-बिहार का है और उसके बाप बनने की ख़बर आती तो हल्ला होता कि फलां ने अपना लंगोट गांव भेज दिया था, सो बच्चा हो गया है।

यदि वह इन दोनों प्रांत छोड़ किसी अन्य प्रांत का है तब कहा जाता कि सैनिक को 'पत्र-पुत्र' की प्राप्ति हुई है।

यानी घर से पत्र द्वारा सूचना आना कि फलां सैनिक बाप बन गया है।

खालू तब राजस्थान बार्डर पर थे, जब उन्हें पत्र द्वारा सूचना मिली कि वे पहली संतान के पिता बन गए हैं।

लेकिन ये बात खालू बखूबी जानते थे कि सनूबर के रूप में 'पत्र-पुत्री' ही तो मिली है।

यूनुस को इन सबसे क्या? वह जानता था कि सनूबर एक अच्छी लड़की है। देखने-सुनने में ठीक है। पढ़-लिख रही है। घर का काम-काज ठीक-ठाक निपटा लेती है। कुरआन पाक की तिलावत कर लेती है। रमज़ान माह में उन ख़ास दिनों के अलावा बाकी के रोज़े पूरे रखती है। नमाज़ यदा-कदा पढ़ लेती है।

रिश्ते में सनूबर और यूनुस भाई-बहिन थे।

ख़ालाज़ाद भाई-बहिन!

यूनुस ये भी जानता था कि इस्लामी-समाज में ये रिश्ता प्रेम या शादी के लिए बाधक नहीं!

:

यूनुस ने अपनी अम्मा के मुंह से खाला के बारे में कई बातें सुनी हैं।

खाला तब तेरह बरस की थीं, जब उनका ब्याह हुआ था।

यूनुस की अम्मा खाला से दो-तीन साल बड़ी थीं।

यूनुस का ननिहाल बेहद ग़रीबी में अपने दिन काटा करता था। असुविधाओं और घोर अभावों के बीच खाला और अम्मा पली-बढ़ीं।

उनके पिता मूलत: चरवाहा थे।

अपने गांव और आस-पास के एक-दो गांव-वालों की बकरियां चराते थे।

यूनुस के नाना का नाम था जहूर मियां।

पतली-दुबली काया, हाथ-पैर किसी पेड़ की टहनी जैसे टेढ़े-मेढ़े, पिचके गालों पर झुर्रियां, ठुड्डी पर थोड़े से काले-सफेद बाल, मूंछें सफाचट, और गंजे सिर पर लपेटा गया गमछा। वह गमछा हमेशा उनके साथ रहता। बदन पर वह एक लट्ठे के कपड़े की बंडी और नीचे चौखाने वाला तहमद पहनते। जहूर मियां के कपड़े सप्ताह में दो बार धुलते।

खाला का नाम सकीना था।

यूनुस की अम्मा का नाम अमीना।

अम्मा बताती हैं कि खाला बचपन से ही बड़ी झगड़ालू थीं। वह गांव के लड़कों को पीट दिया करती थीं। लड़के उनसे सीधा-सीधा लड़ने से घबराते। बोलते ये सकीना मुसल्ली बड़ी बदमाश है। उससे निपटना हो तो उस पर चोरी से वार करो। लड़के मंसूबे बनाते रह जाते और अक्सर पिट जाते।

ऐसी दुष्ट लड़की थीं खाला।

सलवार-कुर्ता साल में एक बार बनता, ईद के मौके पर। एक जोड़ी कपड़ा पिछले साल का और एक नए साल का। बस यही दो जोड़ी कपड़े हुआ करते थे। हां, दो बहनों के नए-पुराने कपड़ों को अगर एक कर दिया जाए तो इस तरह चार जोड़ी कपड़े हो जाते थे। नहाने-धोने के लिए पिता का तहमद बदन लपेटने के काम आ जाता।

गांव में तीन कुंए थे। एक तो बामनों का था। एक कुर्मियों का और तीसरे कुंए का पानी मुसलमान और छोटी जाति के लोग इस्तेमाल करते। फिर प्राथमिक विद्यालय के प्रांगण में एक हेंड-पम्प भी लग गया था।

पीने का पानी कुंए से आता और नहाने-धोने के लिए वे गांव के बाहर से बहने वाली पहाड़ी नदी जाया करते थे। जहां आराम से खाला और अम्मा अपनी सहेलियों के संग नहाया करतीं।

यूनुस की नानी बीमार रहा करतीं। उन्हें खून की उल्टियां होतीं। गांव मे टीबी जैसी बीमारी का नाम लोग मुंह में न लाते। भूत-जिन्न-चुड़ैल के प्रकोप ही सारी बीमारियों के कारण हुआ करते। सयाने हर विपत्ति का हल गंडे-तावीज़, तंत्र-मंत्र और रिध्दि-सिध्दि के ज़रिए करते। गांव में जगह-जगह देवताओं के चौतरे बने थे।

पिता जहूर मियां जड़ी-बूटियों के स्वयंभू विशेषज्ञ थे। जंगल में बकरियां चराते-चराते उन्हें न जाने कितनी जड़ी-बूटियों की जानकारी हो गई थी। वह सांप-बिच्छी काटने का मंत्र भी जानते थे। अपनी पत्नी के इलाज के लिए वह अजीबो-गरीब जड़ियां घर लाते। उन्हें स्वयं कूटते-छानते। उनका अर्क निकालते और पत्नी का इलाज करते।

जुमा की नमाज़ पढ़ने कस्बे जाते तो बड़े हाफिज्जी से मिन्नतें करके पत्नी के लिए तावीज़ ले आते। इन सब टोने-टोटकों के कारण या फिर आयु-रेखा के कारण मां की तबीयत कभी नरम होती कभी गरम। वह असमय मर गईं।

कहने को तो मां ने पांच बच्चे जने, लेकिन बचे सिर्फ तीन ही।

यूनुस की अम्मा बतातीं-''अम्मा जादे दिन नहीं जिंदा रहीं। नहीं तो हम लोग ऐसे यतीम न होते।''

यूनुस के एकमात्र मामा गंजेड़ी-शराबी निकल गए।

अपने आंगन में गांजा के पौधे रोपने के अपराध में जेल भी काट आए हैं। उन्होंने विधिवत शादी-ब्याह किया नहीं। गांव की एक केवटिन को संग रखे हैं, सो उनसे बहनों ने रिश्ता तोड़ लिया है। जात-बिरादरी से उन्हें 'बैकाट' कर दिया गया है। कहते हैं केवटिन के पहले मर्द से हुए बच्चों को वही पालते हैं। उनके घर में मुसलमानों का कोई परब-त्योहार नहीं मनाया जाता। हां, दीवाली, होली, खुजलईयां, रामनवमी आदि परब मनाए जाते हैं।

यूनुस के नाना जहूर मियां के मरने के बाद यूनुस की अम्मा और खाला एक बार उनके चहल्लुम के अवसर पर गांव गई थीं।

तब मामा और उस केवटिन मामी ने उनकी खिदमत तो दूर यूनुस के अब्बा और खालू की भी कोई आव-भगत न की। खालू वैसे भी क्रोधी स्वभाव के व्यक्ति ठहरे। मिलिटरी के सैनिक। इतना गुस्साए कि खाला को तलाक देने की धमकी तक दे डाली। वो तो अब्बा के एक दोस्त बगल के गांव में रहते थे। वह मिल गए और खालू को अब्बा वहीं ले गए। तब जाकर कहीं उनका गुस्सा ठंडाया था। फिर भी उन्होंने जीते जी उस गली में दुबारा क़दम न रखने की क़सम खा ही ली थी। किसी तरह चहल्लुम की फातिहा कराकर वे लोग जो वहां से लौटे तो फिर दुबारा उधर का रूख न किया।

मामा मरे चाहे चूल्हे में जाए।

यूनुस की अम्मा की शादी कोतमा में हुई। यूनुस के अब्बा तब घूम-घूम कर अखबार बेचा करते थे। जहूर मियां को बड़े हाफिज्जी ने इस रिश्ते की जानकारी दी थी। बताया था कि लड़का यतीम ज़रूर है किन्तु पढ़ा-लिखा है। उसमें कोई ऐब नहीं। न कहो कभी बीड़ी पी लेता है। हां, खुद्दार है। स्वयं कमाता है। वहीं मदरसे में पला-बढ़ा है।

फिर बड़े हाफिज्जी ने मश्विरा दिया-''तुम कहो तो वहां के इमाम से इस मंसूब के लिए बात करूं। अल्लाह चाहेगा तो बात बन भी सकती है।''

नाना ने हामी भर दी।

और इस तरह बात पक्की हुई और फिर उनका निकाह भी हो गया।

शादी के बाद पुरूष की किस्मत बदलती है।

यह बात अब्बा पर भी चरितार्थ हुई।

उन्हें सिंचाई विभाग में अस्थाई चपरासी की नौकरी मिली।

उनमें पढ़ने की लगन तो थी ही।

प्राईवेट तौर पर हाई-स्कूल की परीक्षा में बैठे।

उस साल परीक्षा केंद्र में जम कर नकल हुई।

अब्बा पास हो गए और इस पढ़ाई के बदौलत वहीं तरक्की पाकर बाबू बन गए।

'डिस्पेच-क्लर्क'

ठेकेदार के मुंशी वगैरा आते और चिट्ठी-पत्री पाने के लिए खर्चा करते।

इससे थोड़ी बहुत ऊपरी आमदनी भी हो जाती थी।

राज्य-सरकार की नौकरी में वैसे भी तनख्वाह काफी कम थी।

कहते हैं कि अम्मा की शादी के बाद खाला भी पिता जहूर मियां को अकेला छोड़कर कोतमा अपनी बड़ी बहिन के ससुराल आ गईं।

शायद इसीलिए अब्बा मूड में रहते हैं तो कहते हैं कि एक ठो साली के अलावा मुझे दहेज में कहां कुछ मिला। ठग लिया ससुरे ने।

यूनुस ने अपनी अम्मा के मुंह से सुना कि खाला रोया करतीं और अल्लाह से दुआ मांगती कि अल्लाह मियां, या तो हमें अपने पास बुला लो या फिर हमरा निकाह करवा दो।

अब्बा और अम्मा के प्रयासों से पास के गांव की विधवा के इकलौते बेटे से खाला का निकाह हुआ।

खालू फौज में नौकरी करते थे।

खालू की अंधी-बूढ़ी विधवा मां कतई नहीं चाहती थी कि उनका लख्ते-जिगर, नूरे-नज़र, कुलदीपक पुत्र फौज में भरती होकर जान जोखिम में डाले।

इसीलिए खालू ने अपनी मां से चोरी-छिपे भरती-अभियान में भाग लिया।

कद-काठी तो ठीक थी ही।

गांव का खेला-खाया जिस्म।

उनका चयन कर लिया गया था।

वे जानते थे कि मां राज़ी न होंगी, सो उनसे बिना बताए नौकरी ज्वाइन कर ली।

जब ट्रेनिंग के लिए बुलावा आया तो मां को पता चला।

बेटे की ज़िद के आगे मां झुकी।

बूढ़ी विधवा ने बेटे को घर से बांधने के लिए युक्ति सोची। लगी अपने चांद से बेटे के लिए कोई हूर-परी सी बहू।

इधर-उधर बात चलाई।

फिर जहूर मियां के बेटी के बारे यूनुस के अब्बा से जानकारी मिली तो जैसे उनकी मन की मुराद पूरी हुई।

सोचा गरीब घर की लड़की है। दिखावा न करेगी और बेटे की गृहस्थी की गाड़ी को ढंग से खींच ले जाएगी।

सो उन्होंने हामी भर दी।

खाला की उम्र तब तेरह-चौदह की होगी और खालू की चौबीस-पच्चीस।

वैसे क़ायदे से देखा जाए तो जोड़ी बेमेल थी।

लेकिन गांव-गिरांव की लड़कियां अल्पायु में ही वैवाहिक जीवन की बारीकियां जान-समझ जाती हैं।

अरहर के खेत, नदी-नाले के घाट, पनघट-पगडंडी आदि में वे यौन-विज्ञान के गूढ़ सबक सीखने लगती हैं।

बकरियां चराते-चराते खाला भी कुछ ज्यादा उच्छृंखल हो चुकी थीं।

कहते हैं कि उनके कई आशिक थे।

वह बहुत होशियार थीं।

लाईन सभी को देती थीं, किन्तु एक सीमा तक......बस्स!

हां, ममदू पहलवान की मुहब्बत के आगे उनकी एक न चलती, खाला इस तरह पिघलतीं, जैसे आग के आगे बर्फ।

विवाह के बाद खालू कुछ दिन गांव में रहे।

खाला के तब दिन दशहरा और रात दीवाली हुआ करती थी।

फिर जैसे ही छुट्टियां खत्म हुईं, खाला की आंखों में आंसू देकर खालू फौज में वापस लौट गए। उन्होंने सुहागरात में खाला से कई वादे करवाए।

जैसे कि अपनी विधवा मां की देखभाल के लिए खालू ने विवाह किया है, इसलिए मां की देखभाल में कोई चूक न हो।

जैसे कि वे घर में इकलौते हैं, गांव में तमाम खेती योग्य भूमि है, उसे इस्तेमाल लायक बनाया जाए ताकि फौज से रिटायरमेंट लेकर जब वह लौटें, तब आराम से खेती-किसानी करके दिन गुजारे जाएंगे।

जैसे खालू को अपनी और घर की इज्ज़त से प्यार है, खाला से ऐसा कोई क़दम न उठे, जिससे इस घर की मर्यादा पर बट्टा लगे।

खाला प्रेम के पींगे झूलती हर बात पर 'हां' कह देतीं।

उन्हें क्या मालूम था कि वादा करना आसान है और उसे निभाना कितना कठिन होता है।

खालू के फौज में वापस लौटते ही उनका मन ससुराल में न लगा।

मन लगता भी कैसे?

बूढ़ी अंधी सास बड़ा हुज्जत करती।

बात-बात पर टोकती।

वैसे भी खाला एक आजाद पंछी की तरह अपने मैके में पली-बढ़ी थीं। उन्हें किसी का अंकुश या लगाम कहां बर्दाश्त होता।

सास की कल-कल से तंग आकर एक दिन वे अपने मैके चली गईं।

खालू की अनुपस्थिति में उनके अधिकतर दिन मैके में ही गुज़रे। विवाह हो जाने के बाद ममदू पहलवान से उनका इश्क अब बेधड़क चल निकला। उनके प्रेम की गाड़ी पटरी या बिना पटरी के भी धकाधक दौड़ने लगी।

खालू जब तक बाहर रहते, खाला ज्यादातर अपने मैके में रहती थीं।

खालू के गांव में पीने का पानी की तकलीफ़ थी। निस्तार के लिए तो गांव के बाहर तालाब मे लोग पहुंचते थे। गांव के बड़े गृहस्थ पटेल के घर एक कुंआ था। उसमे साल भर पानी रहता। खालू की फौज की कमाई से खालू की वृध्दा मां ने एक कुंआ खुदवाया था, जिसमें जेठ महीना छोड़ साल भर पानी रहता था। बुढ़िया ने सोचा था कि बहू आएगी तो उसे आराम रहेगा।

लेकिन बहू को कहां थी सास की चिंता।

वह तो सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए जिंदा थी।

खालू छुट्टियों पर आते तो एक-दो दिन गांव में रहते, फिर उनका मन उचट जाता। फौज में परिवार की कमी तो खलती है, वरना फौज जैसा सुख और कहां?

खालू किसी न किसी बहाने बूढ़ी मां को मना कर अपने ससुराल चले जाते। वहां जाकर खाला के मोहपाश में ऐसा बंधते कि फिर उन्हें दीन-दुनिया का होश न रहता। वे ये भी भूल जाते कि उन्हें फौज में वापस भी जाना है।

खाला के रेशमी रूप का जादू और समर्पण की पेशेवराना अदा का मर्म खालू कहां समझ सकते थे। अकाल-ग्रस्त आदमी भूख की शिद्दत मे कहां तय कर पाता है कि दिया गया खाना जूठा है या बासी। वह तो ताबड़-तोड़ पेट की आग बुझाने में जुट जाता है।

खालू की बूढ़ी मां इसी ग़म में असमय मर गईं कि उस रंडी, छिनाल बहुरिया ने उसके बेटे पर जाने कैसा जादू कर दिया है। उसके इकलौते बेटे पर उस जादूगरनी ने ऐसा टोना किया कि वह अपनी बूढ़ी मां को एकदम भूल गया।

सनूबर का जन्म उसके ननिहाल में हुआ।

कई दिन बाद बूढ़ी सास को सूचना मिली कि वह दादी बन गई हैं।

उनकी बहू ने एक लड़की पैदा की है। ये खबर पाकर बुढ़िया ने अपना माथा पीट लिया था।

फिर भी लोक-मर्यादा का लिहाज कर रिश्ते के एक भतीजे को साथ लेकर वह बहू के मैके गईं।

खाला छठी नहा चुकी थीं।

वे आंगन में खाट पर बैठी सनूबर के बदन की मालिश कर रही थीं।

बुढ़िया सास को देख उनका माथा ठनका।

फिर भी उन्होंने सलाम किया और दोनों को पैरा से बने मोढ़े पर बिठाया।

घर में उनके भाई न थे। केवटिन भाभी भर थी।

खाला ने उन्हें आवाज़ लगाई।

खालू की बुढ़िया मां ने उन्हें किसी को बुलाने से मना कर दिया।

वैसे भी उस घर में वे खाना-पानी नहीं पी सकती थीं, क्योंकि खाला के भाई ने एक कुजात को अपनी ब्याहता बनाकर रखा है। ऐसे घर का दाना-पानी हराम जो होता है।

बस उन्होंने इतना ही कहा कि एक बार नवजात बच्ची को प्यार करेंगी और फिर चली जाएंगी। हां, यदि यहां कोई तकलीफ हो तो बहू भी चाहे तो साथ चल सकती है।

सनूबर अपनी दादी की गोद में आकर खेलने लगी।

दादी ने अपने भतीजे से पूछा-''किस पर गई है बच्ची?''

भतीजा कैसे निर्णय लेता कि बच्ची किस पर गई है।

उसे तो बच्ची सिर्फ रूई का गोला लग रही थी।

हां, फिर भी उसने उस बच्ची के चेहरे की कुछ विशेषता बुढ़िया को बताने लगा।

तभी घर में ममदू पहलवान आ गया।

भतीजे ने जो ममदू पहलवान को देखा तो उसे ऐसा लगा कि जैसे बच्ची के चेहरे की बनावट कहीं उस पहलवान से तो नहीं मिलती है?

भतीजा अभी नादान था।

उसने ऐसे ही कह दिया कि इन चच्चा जैसी तो दिखती है ये लड़की।

खाला के चेहरे का रंग उड़ गया।

ममदू पहलवान के तो जैसे पैरों तले ज़मीन निकल गई।

भतीजे को क्या पता था कि उसने क्या कह दिया?

बस, फिर क्या था। बुढ़िया सास ने अपने अंधेपन को कोसा और भतीजे से कहा कि तत्काल वापस चले।

उन्होंने वहीं अपनी बहू को खूब खरी-खोटी सुनाई।

बेटे को सारी बात बताने का संकल्प लिया।

वह इतना नाराज़ न होतीं यदि उनकी छिनाल बहू ने पोता जना होता या उस नवजात शिशु के नैन-नक्श ददिहाल या ननिहाल किसी पर होते।

बुढ़िया मां हमेशा ताने दिया करतीं कि उसके बेटे के साथ उस चुड़ैल बहू ने छल किया है। वह बदचलन है। वह बेवा बिचारी क्या करें, उस चुड़ैल ने तो उनके बेटे पर जादू किया हुआ है। उसके गबरू जवान बेटे को नज़रबंद करके रखा हुआ है।

लेकिन ये भी सच है कि खालू को इतनी संतानों का पिता कहलाने का गौरव खाला ही ने तो उपलब्ध कराया है।

इसी बात पर वह अपनी सास को प्रताड़ित किया करतीे-''अगर तुम्हारे बिटवा जैसे मउगे-फउजी के भरोसे रहती तो इस खानदान में ईंटा-पथरा भी न हुआ होता। फिर देखते कैसे चलता तेरा वंश!''

फौज का खाया-पिया जिस्म खाला के आगे बौना हो जाता।

नतीजतन खालू जिस बच्चे को सामने पाते, पीट डालते।

यूनुस सब जानता समझता था। वह ये भी जानता था कि दुधारू गाय की लात भी प्यारी होती है। खाला जो खालू की चोरी और कभी सीनाजोरी में अपने गरीब खानदान वालों की माली मदद करती हैं, उसके आगे लोग उनके गुनाह नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

इसी तरह खाला सभी की कोई न कोई मजबूरी जानती। उनसे जुड़े तमाम लोग उनके एहसानों के बोझ तले दबे हुए हैं।

खालू को खाला एक पालतू जानवर बना कर रखतीं।

खालू जब कभी गुस्साते तो बच्चों को मारते-पीटते। खाने की थाली पटकते। तमतमाए खालू घर से निकल जाते। लेकिन उनका गुस्सा ज्यादा देर तक टिकता नहीं। जल्द ही वह खाला की लल्लो-चप्पो करने लगते।

आठ

ऐसी बात नहीं है कि खालू की बूढ़ी मां कलकलहिन थी या कि खाला पर कोई झूठा इल्ज़ाम लगाया गया था।

यूनुस को भी खाला की ग़ैर-ज़रूरी चंचलता पसंद न आती। उसे लगता कि एक उम्र के बाद इंसान को गम्भीर हो जाना चाहिए।

खाला जब गैर मर्दों से ठिठोलियां करतीं तो यूनुस का दिमाग खराब हो जाता।

यूनुस अक्सर खाला की दिनचर्या के बारे में सोचा करता। खाला ज़माने से बेपरवाह सिर्फ अपनी ही धुन में लगी रहतीं। लगता उन्हें किसी प्रकार की कोई चिन्ता ही न हो। सिर्फ अपने लिए जीना...

सुबह उठते ही सबसे पहले खाला आईने के सामने आ खड़ी होतीं।

होंठ पर बह आए लार और आंख की कीचड़ गमछे के कोर साफ करतीं।

अपने बिखरे बालों को संवारतीं।

चेहरे को कई कोणों से देखतीं।

फिर आंगन में जाकर टंकी के पानी से कुल्ला करतीं और चेहरे पर पानी के छींटें मारकर तौलिए से रगड़कर चेहरा साफ करतीं।

उसके बाद टूथ-ब्रश में ढेर सारा पेस्ट लगाकर बाहर आंगन में आ जातीं। टूथ-पेस्ट खालू मिलेटरी कैंटीन से लाया करते थे।

बाहर फाटक के पास खड़े होकर अड़ोस-पड़ोस की झाड़ू बुहारती औरतों से गप्प का पहला दौर चलातीं। जिसमें बीती रात के मनगढ़ंत अनुभवों पर दांत निपोरा जाता। टूथ-पेस्ट से उत्पन्न झाग क्यारी में थूकते हुए खाला तेज़ आवाज़ में हंसतीं।

खाला का सीना और कूल्हे भारी हैं।

बिना अंतर्वस्त्रों के मैक्सी के लबादे में उनके जिस्म के उभार-उतार स्पष्ट दीखते।

खाला का मैक्सी पहनना यूनुस को फूटी आंख न भाता। वैसे भी उनका जिस्म किसी ढोल के आकार का था। ऐसे जिस्म पर सलवार-कुर्ता या फिर साड़ी ठीक रहती। मैक्सी वैसे तो तन ढांपने का विकल्प होता है। ठीक है कि उसे रात में सोते समय पहना जाए या फिर घर के काम-काज करते हुए जिस्म पर डाल ले इंसान। किसी पराए मर्द के सामने या फिर घर से बाहर निकलने की दशा में इंसान को शालीन पोशाक पहनना चाहिए। या फिर मैक्सी ज़रूरी ही हो तो किसी के सामने आने से पूर्व दुपट्टा डाल लेना चाहिए।

सनूबर को भी अपनी मम्मी का ये पहनावा पसंद न आता। वह अक्सर उन्हें टोका करती कि मम्मी मैक्सी पहन कर बाहर न निकला करो। मैक्सी तो बेडरूम-डे्रस होती है।

लेकिन खाला किसी की सही सलाह मान लें तो फिर खाला किस बात की!

मुंह धोने के बाद खाला किचन की तरफ जातीं, जहां सनूबर के संग नाश्ता बनाने लगतीं।

नाश्ता-वास्ता के बाद सनूबर बर्तन धोने भिड़ जाती और खाला टंकी के पास टब भर कपड़े लेकर बैठ जातीं। कपड़े धोने के बाद वे वहीं नहाने लगतीं। खाला बाथरूम में कभी नहीं नहाया करतीं थी।

नहा-धोकर खाला बेड-रूम आ जातीं। फिर श्रृंगार-मेज़ और आलमारी के दरमियान उनका एक घण्टा गुज़र जाता।

इस बीच सनूबर बर्तन धोकर नहा लेती और स्कूल जाने की तैयारी करने लगती।

तभी खाला की आवाज़ गूंजती-''अरे हरामी, हीटर में दाल चढ़ाई है या अइसे ही स्कूल भाग जाएगी?''

सनूबर स्कूल ड्रेस पहने बड़बड़ाती हुई किचन में घुसती और कूकर में दाल पकने के लिए चढ़ा देती।

कूकर पुराना हो चुका है, उसका प्रेशर ठीक से बनता नहीं, इसलिए उसमें दाल पकने मे समय लगता है।

सभी बच्चे स्कूल चले जाते और खाला बन-ठन कर बाहर निकल आतीं।

तब तक एक-दो पड़ोसिनें भी खाली हो जातीं।

फिर उनमें गप्पें होतीं तो समय जैसे ठहर जाता।

एक-दो बच्चे हॉफ-टाईम पर घर आते तो भी खाला टस से मस न होतीं। बच्चे स्वयं खाने का सामान खोजकर खाते।

दुपहर के एक बजे के आस-पास औरतों की सभा विसर्जित होती।

घर आकर खाला भात के लिए अदहन चढ़ातीं और जल्दी-जल्दी चावल चुनने बैठ जातीं। चावल पसाकर फुर्सत पातीं, तब तक चिट्टे-पोट्टे स्कूल से लौटने लगते। दुपहर के खाने में सब्जी कभी बनी तो ठीक वरना अचार के साथ दाल-भात खाना पड़ता। देहाती टमाटर के दिनों में सनूबर जब स्कूल से लौटती तो खालू के लिए टमाटर की चटनी सिल में पीसती थी।

दुपहर खाना खाकर खाला टीवी देखते-देखते सो जातीं।

शाम को नींद खुलती तो फिर वही आईने के सामने वाला दृश्य दुहरातीं।

फिर फ्रेश होकर साड़ी-ब्लाउज़ पहनतीं। साड़ी पहनने का उनका सलीका किसी अफसराईन की तरह का होता। चेहरे को पाउडर-लिपिस्टिक-काजल से सजातीं।

तब तक उन्हीं की तरह उनकी कोई सहेली आ जाती और उसके साथ बाजार निकल जातीं। सब्जियां या अन्य सामान वह स्वयं खरीदा करतीं थीं।

खालू तो गेहूं पिसवाने और चावल-दाल लाने जैसे भारी काम करते।

सात-आठ बजे तक खाला लौटतीं।

फिर सनूबर के साथ बैठकर रात के खाने की तैयारी में लग जातीं।

इस बीच कोई मिलने वाला या वाली आ जाए तो फिर पूछना ही क्या?

बच्चे पढ़ें या फिर उधम-बाजी करें, खाला पर कोई असर न पड़ता।

उन्हें तो हामी भरने वाला मिल जाए तो आन-तान की हांकती रहेंगी।

सनूबर इसीलिए बड़बड़ाया करती कि मम्मी के कारण घर में इतना हल्ला-गुल्ला मचा रहता है कि पढ़ाई में दिल नहीं लग पाता। गप्पें हांकने के क्रम में खाला घर आए लोगों को चाय-नमकीन भी कराया करतीं। जिसके लिए सनूबर को परेशान होना पड़ता।

ऐसे घर में अनुशासन की कल्पना भी व्यर्थ थी।

नौ

यूनुस याद करने लगा अपनी ज़िन्दगी का वह मनहूस दिन, जब जमाल साहब उसके जीवन में आए और एक निश्चित दिशा में चलती उसकी जीवन की गाड़ी पटरी से उतर गई....

उसे अच्छी तरह याद है वो जुमा का दिन था, क्योंकि उस दिन घर में गोश्त-पुलाव पका था। होता ये कि जुमा की नमाज़ अदा करके घर आने पर सब एक साथ बैठकर खाना खाते। यूनुस नमाज़ के बाद पढ़े जाने वाले सलातो-सलाम में शामिल न होता। उसमें इतना धैर्य कहां होता। वहर् फज़ नमाज़ पढ़कर मस्जिद से सबसे पहले भागने वालों में शामिल रहता। वैसे भी वह भूख बर्दाश्त नहीं कर सकता था।

गर्मी के कारण उसे गोश्त-पुलाव के साथ प्याज़ खाने का मन हुआ। इसलिए घर आकर यूनुस ने सबसे पहले सब्ज़ी की टोकंरी से एक प्याज़ उठाया। फिर उसे काटने के लिए छूरी खोजने रसोई में घुसा।

सनूबर स्कूली ड्रेस पहने हुए किचन में उकड़ू बैठकर चपड़-चपड़ गोश्त-पुलाव खा रही थी। यूनुस को देख वह मुस्कुराई और अपने प्लेट से गोश्त की एक बोटी उठाकर यूनुस की ओर बढ़ाई। यूनुस ने उसकी बड़ी-बड़ी आंखों मे शरारत और मुहब्बत के मिले-जुले भाव देखे।

यूनुस ने बोटी मुंह के हवाले की।

एक दम रसगुल्ले की तरह मुंह में पिघल गया था गोश्त...वाक़ई रहमत चिकवा खालू के नाम पर अच्छा गोश्त देता है।

सनूबर ने यूनुस के हाथ में प्याज़ देखकर उससे प्याज़ मांग लिया।

खाना खत्म कर प्लेट में ही हाथ धोकर सनूबर एक तश्तरी में प्याज़ क़ाटने लगी। प्याज़ के पतले-पतले गोल टुकड़े।

तभी खाला किचन की तरफ आईं।

यूनुस के मुंह को चलता देख उन्होंने पूछा-''गोश्त कैसा बना है?''

यूनुस ने रहमत चिकवा की बड़ाई करते हुए कहा-''एक नम्बर का माल है खाला! रहमतवा खालू के नाम पर माल ठीक देता है।''

वाकई पैसे भी दो और माल भी ठीक न मिले, कितना तकलीफ़ होता है। कूकर में गलाते-गलाते मर जाओ। गोश्त भी इतना बदबूदार निकल आए कि घिन हो जाए। आदमी गोश्त खाने से तौबा कर ले।

खाला ने कहा-''अल्लाह का फ़ज़ल है कि रहमतवा ठीकै गोश्त देता है।''

अमूमन जुमा और इतवार के दिन रहमत चिकवा की दुकान से तीन पाव गोश्त मंगवाया जाता। यूनुस ही गोश्त लेने जाता। कालोनी के बाहर रेल्वे लाईन के उस पार नाले के एक तरफ कसाईयों की दुकानें प्रतिदिन सजतीं। रेल्वे की ज़मीन पर अवैध रूप से क़ब्ज़ा करके चिकवा लोगों ने गोश्त बेचने की दुकानें और रहने के लिए घर बना लिए थे। कहते हैं कि आरपीएफ वाले आकर वसूली कर जाते हैं। रेल्वे वालों से मिली भगत है सब।

उस अघोषित मुहल्ले को कसाई-टोला कहा जाता।

रहमत चिकवा खालू के गांव का था, इसलिए अस्सी रूपए किलो का माल उनके घर साठ रूपए के हिसाब से आता।

यूनुस कभी सोचता कि इतने काम सीखे उसने लेकिन कसाई का काम न सीखा। वैसे घर में बकरीद के मौके पर होने वाली कुरबानी में बाहर से कसाई न बुलवाया जाता। अब्बू और सलीम भईया बकरे को ज़िबह कर खालपोशी कर लेते तो यूनुस बोटियां बना लेता था। असली कलाकारी तो खाल को सही-सलामत बकरे के जिस्म से अलग करने में है। उस खाल को स्थानीय मदरसे में भेजा जाता। जिसकी नीलामी होती और प्राप्त पैसे से मदरसे की आमदनी हो जाती।

गोश्त लेने खाला यूनुस को सुबह सात बजे दौड़ा देतीं। कहतीं कि चिकवा ससुरे सुबह ठीक माल दिए तो ठीक वरना बाद में दो-नम्बरिया माल मिलता है।

सात बजे रहमत अपनी दुकान सजा नहीं पाता था। इसलिए यूनुस सीधे उसके घर चले जाता।

घर के बाहर ही तो गोश्त की दुकान थी।

रहमत चिकवा की एक बेटी थी। सांवली सी नटखट लड़की। नैन-नक्श तीखे। सांवली रंगत।

यूनुस को देख जाने क्यों वह मुस्कुराती।

रहमत की बीवी उसे 'बानू' कह कर पुकारती। वह देहाती जुबान में बातें करती।

उसमें एक ही ऐब था। उसके पीले-मटमैले टेढ़े-मेढ़े दांत। जब वह हंसती या कुछ बोलती तो उसके दांत बाहर निकल आते और सारा मज़ा किरकिरा हो जाता।

वह जब भी रहमत के घर जाता, वहां टट्टर की चारदीवारी के अंदर बकरियों के मिमियाहट गूंज रही होती और 'बानू' आंगन में झाड़ू लगाते मिलती।

जब वह झुकती तो कुर्ते के कटाव से उसके उभार छलक-छलक आते। यूनुस को यकीन है कि 'बानू' जानबूझ कर उसे यह दर्शन-सुख देना चाहती थी।

फिर रहमत के लिए चाय या पानी लेकर आती तो यूनुस भी उसमें शामिल हो जाता।

चाय के कप या गिलास पकड़ाते समय वह आसानी से अपने हाथों का स्पर्श उसके हाथ से होने देती। कप पकड़े वह उसका चेहरा निहारता। बस, यहीं गड़बड़ हो जाती। आंखें मिलते ही 'बानू' मुस्कुराती। उसके होंठ पलट जाते और खपरैल से मटमैले दांत बाहर निकल आते। खूबसूरती का तिलस्म टूट जाता। यूनुस को ऐसा महसूस होता जैसे उसने रहमत की दुकान के कोने में पड़े, बकरों के कटे सिर देखे हों, जिनके दांत इसी तरह बाहर निकले रहते हैं।

रहमत चिकवा खस्सी के नाम पर कैसा भी गोश्त काट कर बेचने के लिए बदनाम है। ऐसी-वैसी बकरी काट कर रहमत बड़ी सफाई से उसके मादा अंगों की गवाही निकाल देता। फिर उस जगह किसी बकरे के नर-अंग बड़ी सफाई से 'फिट' कर देता। फिर चीख-चीख कर ग्राहकों को बुलाता-''अल्ला कसम भाईजान, खस्सी है खस्सी! एक नम्बर का माल!''

मियां भाई तो अंदाज़ लगा लेते कि मामला क्या है, लेकिन चोरी-छिपे मटन खाने वाले हिन्दू ग्राहक क्या समझते! वे तो वैसे ही नज़र बचाकर मटन खरीदने आते या फिर उनके चेले आते। उन्हें बेवकूफ़ बनाना तो रहमत के बाएं हाथ का खेल था। वे आसानी से उसके झांसे में आ जाते।

खालू से अच्छे सम्बंधों के कारण रहमत चिकवा उन्हें सही माल देता।

दस

किस्सा कोताह ये कि जुमा की नमाज़ पढ़कर जब खालू घर आए तो वह अकेले न थे। उनके साथ एक युवक था।

खालू ने उन्हें पहले कमरे में प्लास्टिक की कुर्सी पर बिठाया। फिर पसीना पोंछते हुए अंदर आवाज़ लगाई-''पीछे वाला कूलर बंद है का?''

खाला अंदर से बड़बड़ाई-''बाहर आग बरसन लाग है त मुआ कूलर केतना ठंडक करी?''

वाकई उस बरस गर्मी बहुत पड़ी थी।

फिर खालू ने यूनुस को आवाज़ देकर घड़े से दो गिलास ठण्डा पानी मंगवाया।

यूनुस पानी लेकर आया। देखा कि आगंतुक एक सुदर्शन युवक है। खालू ने उसे इस तरह घूरते देख डांटा-''सलाम करो।''

यूनुस ने सलाम किया।

खालू उस व्यक्ति से बतियाने लगे-''साढ़ू का बेटा है। यहीं 'एमसीए' में पेलोडर चलाता है। आज कल मुसलमानों का हुनर ही तो सहारा है। नौकरी में तो 'मीम' की कटाई तो आप देखते ही हैं।''

यहां खालू का 'मीम' से तात्पर्य अरबी के 'मीम' वर्ण से था। मीम माने हिन्दी का ''। दूसरे शब्दों में मीम माने मुसलमान।

आगंतुक के माथे पर बल पड़ गए-''ग़ल्त बात है भाईजान, हक़ीकतन ऐसा नहीं है। मियां लोग 'एजूकेशन' पर कहां ध्यान देते हैं। अपने पास घर हो न हो, कपड़े-लत्ते हों न हों, बच्चों की किताब-कापी हो न हो लेकिन थोड़ी कमाई आई नहीं कि नवाब बन जाएंगे। गोश्त-पुलाव उड़ाएंगे। बच्चे धड़ाधड़ पैदा किए जाएंगे। अल्ला मियां हैं ही रिज्क़-रोज़ी देने के लिए।''

उन साहब ने जैसे यूनुस के मन की बात की हो।

यही तो सच है। खाली-पीली अपने हिन्दू भाईयों को कोसना कहां तक उचित है। इंसान को पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। कहां कमी है? ये नहीं कि माईक उठाया और लगे कोसने ग़ैरों को।

तब तक खाला भी कमरे में आ गईं।

खालू ने आगंतुक से खाला का परिचय, जमाल साहब के नाम से कराया। बताया उनके नए साहब हैं। नागपुर के रहने वाले।

खाला ने उन्हें सलाम किया।

खाला वहीं तख्त पर बैठ कर जमाल साहब का जाएज़ा लेने लगीं। वह बत्तीस-तैंतीस साल के जवान थे। सांवली रंगत और चेहरे पर मोटी मूंछ। कुछ-कुछ संजय दत्त की तरह की हेयर-स्टाईल। जमाल साहब से खाला ने आदतन पूछा-पाछी शुरू की। पता चला कि उनके वालिद वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड की किसी खदान में कार्मिक प्रबंधक हैं। जमाल साहब की शादी नहीं हुई है, इसीलिए उन्होंने क्वाटर एलॉट नहीं करवाया था। वह आफीसर्स-गेस्ट रूम में रहते हैं।

गर्मी के मारे जैसे जान निकली जा रही हो।

खाला अपने आंचल से पंखे का काम लेने लगीं, जिससे उनके पेट का कुछ हिस्सा और छाती दिखने लगी।

जमाल साहब ने जो समझा हो, लेकिन यूनुस को यह सब बहुत बुरा लगा।

खाला जमाल साहब से बेतकल्लुफ़ हुईं और उन्हें खाने का न्योता दिया।

फिर क्या था।

वहीं तख्त पर दस्तरख्वान बिछाया गया।

किचन में सनूबर ने जो सलाद के लिए प्याज़ काटा था, उसे मेहमान के लिए पेश किया जाने लगा। खालू और जमाल साहब ने साथ-साथ खाना खाया।

बीच में एक बार सालन घटा तो सनूबर को आवाज़ देकर खालू ने बुलाया था।

सनूबर एक कटोरी सालन पहुंचा आई थी।

सनूबर का सालन पहुंचाना यूनुस को अच्छा नहीं लगा।

खाला ने सनूबर का परिचय जमाल साहब से कराया-''बड़की बिटिया है। नवमी में पढ़ती है।''

सनूबर ने जमाल साहब को सलाम किया तो खाला ने टोका-''गधी, खाते समय सलाम नहीं करते हैं न!''

सनूबर झेंप कर भाग गई।

ग्यारह

फिर जमाल साहब खाला के घर अक्सर आने लगे।

खालू घर में हों या न हों, खाला उनकी खूब खातिर-तवज्जो करतीं।

जमाल साहब आते तो टीवी खोलकर बैठ जाते। घर में उर्दू का एक अख़बार आता था। खालू सनूबर से उनके लिए भजिए-पकौड़ी तलवातीं। जमाल साहब कड़ी पत्ती और कम चीनी वाली चाय बड़े शौक से पीते। घर में अच्छे कप न थे। खाला ने बर्तन वाले की दुकान से बोन-चायना वाला कीमती कप-सेट खरीदा था।

जमाल साहब का प्रमोशन हुआ तो वह मिठाई का डिब्बा लेकर आए।

यूनुस उस दिन घर पर ही था।

रसमलाई की दस कटोरियां थीं। बनारसी-स्वीट्स की ख़ास मिठाई।

खाला ने तो रसमलाई खाकर ऐलान कर दिया कि अपने इस जीवन में उन्होंने ऐसी उम्दा मिठाई कभी न खाई थी। खालू ठहरे कंजूस। छेना की मिठाई कभी लाते नहीं। फातिहा-दरूद के लिए वही मनोहरा के होटल से खूब मीठे पेड़े ले आते।

कभी कोई आया या किसी के घर गए तो खोवा की मिठाईयां या बिस्किट वगैरा से स्वागत होता। रसमलाई जैसी मिठाई उन्होंने कभी न खाई थी।

रसमलाई का रस जो कटोरी में बचा था, वे उसे सुड़कते हुए पीने लगीं।

जमाल साहब हंस दिए।

सनूबर, छोटकी और अन्य बच्चों के साथ यूनुस ने भी पूरा स्वाद लेते हुए रसमलाई खाई।

खाला अपनी देहाती में उतर आईं जिसका लब्बोलुआब था कि वाकई दुनिया में एक से एक लज़ीज़ चीज़ें हैं।

इस तरह जमाल साहब उस परिवार में एक सदस्य की तरह शामिल हो गए।

जब उनका मन गेस्ट-हाउस के खाने से ऊब जाता तो वे बिना संकोच खाला के घर आ जाते। वो चाहे कैसा समय हो, खाला और सनूबर, उनके लिए तत्काल कुछ न कुछ खाने की व्यवस्था अवश्य कर देतीं।

जमाल साहब के सामने कभी-कभी खाला सनूबर को डांटने लगतीं या गरियाने लगतीं तो सनूबर नाराज़ हो जाती। इस आवाज़ में सुबकती कि जमाल साहब तक उसके नाक सुड़कने की आवाज़ पहुंच जाए।

फिर जमाल साहब खाला को समझाते कि इतनी सुघड़-समझदार बिटिया को इस तरह नहीं डांटा-मारा करते। सनूबर तो घर-रखनी है। सभी का ख्याल रखती है।

सनूबर उन्हें जमाल अंकल कहती।

यूनुस उन्हें साहब की कहता।

पूरे घरवालों में जमाल साहब की बढ़ती जा रही लोकप्रियता से उसे चिढ़ होने लगी।

चिढ़ का एक और कारण ये भी था कि जमाल साहब के आ जाने से सनूबर अब यूनुस का खास ख्याल नहीं रख पाती।

यूनुस ठेकेदारी मज़दूर ठहरा! उसकी डयूटी का टाईम बड़ा अटपटा था। कभी अलस्सुबह जाना पड़ता और कभी रात के बारह बजे बुलौवा आ जाता। कभी रात के बारह-एक बजे घर वापस लौटता। कपड़े मैले-कुचैले हो जाते। कपड़ों में ग्रीस-मोबिल के दाग लगे होते।

पहले आदतन वह कपड़े स्वयं धोता था। फिर सनूबर मेहरबानी करके उसके कपड़े धोने लगी। अब ये यूनुस का अधिकार बन गया कि सनूबर ही उसके कपडे धोए।

जमाल अंकल के कारण सनूबर को अब किचन में कुछ ज्यादा समय देना पड़ता था। खाला तो सिर्फ हा-हा, ही-ही करती रहतीं। कभी पापड़ तलने को कहेंगी, कभी चाय बनाने का आदेश पारित करेंगी।

खालू आ जाते तो वह भी पूछा करते कि साहब की ख़िदमत में कोई कसर तो नहीं रह गई है।

यूनुस ने यह भी ग़ौर किया कि खाला जमाल साहब के सामने सनूबर को कुछ ज्यादा ही डांटती हैं।

इससे जमाल साहब उन्हें ऐसा करने से मना करते हैं। कहते हैं कि बच्चों को प्यार से समझाना चाहिए।

अक्सर इस बात पर सनूबर सुबकने लगती।

जमाल अंकल उसे अपने पास बुलाते और बिठाकर समझाते कि मां-बाप की बात का बुरा नहीं मानना चाहिए। साथ ही साथ वह खाला को भी समझाते कि बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार करें।

फिर वह दिन भी आया कि जमाल साहब ने आफीसर्स गेस्ट-हाउस के मेस में खाना बंद कर दिया और खालू के घर में उनका खाना बनने लगा।

जीप आती और सुबह का नाश्ता करके वह खदान चले जाते। दुपहर के खाने का पक्का नहीं रहता। यदि देर हो जाती तो वे वहीं कहीं केंटीन वगैरा में कुछ खा-पी लेते। रात का खाना वह खालू के घर ही खाते। उन्होंने संकोच के साथ कुछ पैसे भी देने चाहे, लेकिन खाला ने मना कर दिया।

इसके बदले वह स्वयं कभी गोश्त और कभी अन्य सामान के लिए जेब से पैसे निकालकर देते।

कुल मिलाकर वह भी घर के स्थाई सदस्य बन चुके थे।

रात के दस-ग्यारह बजे तक वह घर में डंटे रहते। कभी टीवी देखते और कभी बच्चों को पढ़ाने लगते। बच्चों के साथ वह हंसी-मज़ाक बहुत करते, जिससे बच्चों का मन लगा रहता।

अड़ोसियों-पड़ोसियों के सामने खाला-खालू का सीना चौड़ा होता रहता कि एक अधिकारी उनका रिश्तेदार है। खाला जमाल साहब को अपना दूर का रिश्तेदार बतातीं, उधर खालू उन्हें अपना रिश्तेदार सिध्द करते। वैसे वह उन दोनों के रिश्तेदार किसी भी कोण से हो नहीं सकते थे क्योंकि खाला-खालू तो एमपी के थे और जमाल साहब नागपूर तरफ के रहने वाले।

लोगों को इससे क्या फ़र्क पड़ता।

आप अपने घर में जिसे बुलाओ, बिठाओ, खिलाओ-पिलाओ या सुलाओ। इससे मुहल्ले वालों की सेहत में क्या फ़र्क पड़ सकता है। बस, फुर्सत में सभी उस घर में पनप रहे किसी नए रिश्ते की, किसी नई कहानी के पैदा होने की उम्मीद टांगे बैठे थे।

यूनुस को जमाल साहब का इस तरह घर में छा जाना बर्दाश्त नहीं हो रहा था। वह देख रहा था कि खाला भी जमाल साहब के सामने खूब चहकती रहती हैं। सनूबर के भी हाव-भाव ठीक नहीं रहते हैं। सभी जमाल साहब को लुभाने की तैयारी में संलग्न दिखते हैं।

एक दिन यूनुस ने खाला के मुंह से सुना कि वह जमाल साहब को अपना दामाद बनाना चाह रही हैं।

अरे, ये भी कोई बात हुई। कहां जमाल साहब और कहां फूल सी लड़की सनूबर। दोनों के उम्र में सोलह-सत्रह बरस का अंतर...

क्या ये कोई मामूली अंतर है?

खाला कहने लगीं-''जब तेरे खालू से मेरा निकाह हुआ तब मैं बारह साल की थी और तेरे खालू तीस बरस के जवान थे। क्या हम लोग में निभ नहीं रही है?''

यूनुस क्या जवाब देता।

सनूबर ने भी तो उस मंसूबे का विरोध नहीं किया था। कहीं उसके मन में भी तो अफसराईन बनने की आकांक्षा नहीं।

यूनुस के पास खानाबदोश ज़िन्दगी का वादा और असुविधाओं-अभावों की मिल्कियत है, जबकि जमाल साहब का साथ माने पांचों ऊंगलियां घी में होना।

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