तभी दूसरी घण्टी बजी।
टनननन टन्न टनन...
सिंगरौली के एक स्टेशन पहले से गाड़ी छूटने का सिग्नल। यानी अगले पंद्रह मिनट बाद गाड़ी प्लेटफार्म पर आ जाएगी। यात्रीगण मुस्तैद हुए।
यूनुस के अंदर घर बना चुका डर अभी खत्म न हुआ था। खालू कभी भी आ सकते हैं। उनके सहकर्मी पाण्डे अंकल इन सब मामलात में बहुत तेज़ हैं। खालू कहीं उनकी बुल्लेट में बैठ धकधकाते आ न रहे हों। एक बार गाड़ी पकड़ा जाए, उसके बाद 'फिर हम कहां तुम कहां!'
प्लेटफार्म परं वह ऐसी जगह खड़ा था, जहां ठंड से बचने के लिए रेल्वे कर्मचारियों ने कोयला जला रखा था। इस जगह से मुख्य-द्वार पर आसानी से नज़र रखी जा सकती थी। उसने सोच रखा था यदि खालू दिखाई दिए तो वह अंधेरे का लाभ उठाकर प्लेटफार्म के उस पार खड़ी माल गाड़ी के पीछे छिप जाएगा। इस बीच यदि पैसेंजर आई तो चुपचाप चढ़कर संडास में छिप जाएगा। फिर कहां खोज पाएंगे खालू उसे।
उसे मालूम नहीं कि अब वह घर लौट भी पाएगा या अपने बड़े भाई सलीम की तरह इस संसार रूपी महासागर में कहीं खो जाएगा।
यूनुस को सलीम की याद हो आई...
उसे यही लगता कि सलीम मरा नहीं बल्कि हमेशा की तरह घर से रूठ कर परदेस गया है। किसी रोज़ ढेर सारा उपहार लिए हंसता-मुस्कुराता सलीम घर ज़रूर लौट आएगा।
सलीम, यूनुस की तरह एक रोज़ घर से भाग कर किसी 'परदेस' चला गया था। 'परदेस' जहां नौजवानों की बड़ी खपत है। 'परदेस' जहां सपनों को साकार बनाने के ख्वाब देखे जाते हैं। वह 'परदेस' चाहे दिल्ली हो या मुम्बई, कलकत्ता हो या अहमदाबाद। उच्च-शिक्षा प्राप्त लोगों का 'परदेस' वाकई परदेस होता है, वह यूएस्से,यूके, गल्फ़ आदि नामों से पुकारा जाता है।
यूनुस अपने गृह-नगर की याद कब का बिसार चुका है। उस जगह में याद रहने लायक कशिश ही कहां थी? मध्यप्रदेश के पिछड़े इलाके का एक गुमनाम नगर कोतमा...
आसपास के कोयला खदानों के कारण यहां की व्यापारिक गतिविधियां ठीक-ठाक चलती हैं।
नगर-क्षेत्र में बाहरी लोग आ बसे और नगर की सीमा के बाहर मूल शहडोलिया सब विस्थापित होते गए। यहां रेल और सड़क यातायात की सुविधा है। एक-दो पैसेंजर गाड़ियां आती हैं। पास में अनूपपुर स्टेशन है, जहां से कटनी या फिर बिलासपुर के लिए गाड़ियां मिलती हैं।
कोतमा इस रूट का बड़ा स्टेशन है। लोग कहते हैं कि सफ़र के दौरान कोतमा आता है तो यात्रियों को स्वमेव पता चल जाता है। कोतमा-वासी अपने अधिकारों के लिए लड़-मरने वाले और कर्तव्यों के प्रति लापरवाह किस्म के हैं। हल्ला-गुल्ला, अनावश्यक लड़ाई-झगड़े की आवाज़ से यात्रियों को अन्दाज़ हो जाता है कि महाशय, कोतमा आ गया। रेल में पहले से जगह पा चुकी सवारियां सजग हो जाती हैं कि कहीं दादा किस्म के लोग उन्हें उठा न फेंकें।
कोतमा मे हिन्दू-मुसलमान सभी लोग रहते हैं किन्तु नगर के एक कोने में एक उपनगर है लहसुई। जिसे कोतमा के बहुसंख्यक 'मिनी पाकिस्तान' कहते हैं। जिसके बारे में कई धारणाएं बहुसंख्यकों के दिलो-दिमाग में पुख्ता हैं। जैसे लहसुई के वाशिन्दे अमूमन ज़रायमपेशा लोग हैं। ये लोग स्वभावत: अपराधी प्रवृत्ति के हैं। इनके पास देसी कट्टे-तमंचे, बरछी-भाले और कई तरह के असलहे रहते हैं। लहसुई मे खुले आम गौ-वध होता है। लहसुई के निवासी बड़े उपद्रवी होते हैं। इनसे कोई ताकत पंगा लहीं ले सकती। ये बड़े संगठित हैं। पुलिस भी इनसे घबराती है।
लहसुई और कोतमा के बीच की जगह पर स्थित है यादवजी का मकान। उसी में किराएदार था यूनुस का परिवार।
इमली गोलाई के नाम से जाना जाता है वह क्षेत्र।
यादवजी कोयला खदान में सिक्यूरिटी इंस्पेक्टर थे। वे बांदा के रहने वाले थे। घर के इकलौते चिराग़। शायद इसीलिए नाम उनका रखा गया था कुलदीप सिंह यादव।
सो गांव में धर्म-पत्नी खेत और घर की देखभाल किया करतीं। यादवजी इसी कारण परदेस में अकेले ही ज़िन्दगी बसर करने लगे। शुरू में थोड़े अंतराल के बाद छुट्टियां लेकर घर जाया करते थे। फिर कोयला खदान क्षेत्र में आसानी से मुंह मारने का जुगाड़ पाकर उनके देस जाने की आवृत्ति कम होती गई।
कुलदीप सिंह यादव जी स्वभाव से चंचल प्रकृति के थे। देस में 'बावन बीघा पुदीना' उगाने वाले यादवजी का,इधर-उधर मुंह मारते-मारते, एक युवा-विधवा के साथ ऐसा टांका भिड़ा कि उनकी भटकती हुई कश्ती को किनारा मिल गया।
वह विधवा पनिका जाति की स्त्री थी। उसने भी कई घाट का पानी पिया था। लगता था कि जैसे वह भी अब थक गई हो। दोनों ने वफ़ादारी की और आजन्म साथ निभाने की क़समें खाई।
पनिकाईन, यादवजी के नाम से खूब गाढ़ा सिंदूर अपनी मांग में भरने लगी।
यादवजी भी छिनरई छोड़कर उस पनिकाईन के पल्लू से बंध गए।
धीरे-धीरे उनका छटे-छमाहे देस जाना बंद हुआ और फिर देस में भेजे जाने वाले मनी-आर्डर की राशि में भी कटौती होने लगी।
यादवजी के प्रतिद्वंदियों ने यादवजी की अपने परिजनों से विरक्ति की खबर देस में यादवाईन तक पहुंचाई।
यादवाईन बड़ी सीधी-सादी ग्रामीण महिला थी। उसने घर में मेहनत करके बाल-बच्चों को पाला-पोसा था। गांव-गिरांव के गाय-गोबर, कीचड़-कांदों और बिन बिजली बत्ती की असुविधाओं को झेला था। यादवजी की बेवफाई उसे कहां बर्दाश्त होती। उसने अपने जवान होते बच्चों के दिलों में पिता के खिलाफ़ नफ़रत के बीज बोए।
बच्चे युवा हुए तो उन्हें नकारा बाप को सबक सिखाने कोतमा भेजा।
बच्चे कोतमा आए और उन्होंने अपने बाप को नई मां के सामने ही खूब मारा-पीटा।
जब यादवजी लड़कों से दम भर पिट चुके तब कोयला-खदान में बसे उनके जिला-जवारियों ने आकर बीच-बचाव किया।
इस घटना से यादवजी की खूब थू-थू हुई।
मज़दूर यूनियन के नेतागण, खदान के कर्मचारीगण और यादवजी के बच्चों के बीच पंचइती हुई। यादवजी की वैध पत्नी के त्याग और धैर्य की तारीफ़ें हुईं। यादवजी के चंचल चरित्र और नई पत्नी की वैधता पर खूब टीका-टिप्पणी हुई। फिर सर्वसम्मति से निर्णय हुआ कि बैंक में यादवजी के खाते से प्रत्येक महीने तीन हज़ार रूपया बांदा में उनकी पत्नी के खाते में स्थानांतरित होगा।
यदि यादवजी इससे इंकार करेंगे तो फिर अंजाम के लिए स्वयं जिम्मेदार होंगे। लड़के जवान हो ही गए हैं।
पनिकाईन छनछनाती रह गई। यादवजी ने इन नई परिस्थितियों से समझौता कर लिया। यादवजी सोच रहे थे कि ये बला कैसे भी टले, टले तो सही।
बैंक मैनेजर ने व्यवस्था बना दी। तनख्वाह जमा होते ही तीन हजार रूपए कोतमा से निकलकर बांदा में उनकी पत्नी के खाते में जमा होने लगे। इस तरह सारे भावनात्मक सम्बंध खत्म करके बच्चे गांव वापस चले गए।
यादवजी बाल काले न कराएं तो एकदम बूढ़े दिखें। दांत टूट जाने के कारण गाल पिचक गए हैं और चेहरा चुहाड़ सा नज़र आता है। बनियाईन-चड्डी में मकान के बाहर बने खटाल में गाय-भैंस को घास-भूसा खिलाते रहते हैं। पानी मिले दूध के व्यापार की देखभाल स्वयं करते हैं।
पनिकाईन की जवानी अभी ढल रही है। कहते हैं कि स्त्री अपनी अधेड़ावस्था में ज्यादा मादक होती है। यह फार्मूला पनिकाईन पर फिट बैठता है। पांच फुट ऊंची पनिकाईन। ज़बरदस्त डील-डौल। भरा-भरा बदन। दूध-घी सहित निश्चिंत जीवन पाकर पनिकाईन कितना चिकना गई है। कहते हैं कि यादवजी को एकदम 'चूसै-डार' रही है ये नार!
यूनुस जब बच्चा था तब उसने उन दोनों को खटाल में बिछी खाट पर विवस्त्र गुत्थम-गुत्था देखा था।
ये था यूनुस के फुटपाथी विश्वविद्यालय में कामशास्त्र का व्यवहारिक पाठयक्रम...
तेरह
कोतमा और उस जैसे नगर-कस्बों में यह प्रथा जाने कब से चली आ रही है कि जैसे ही किसी लड़के के पर उगे नहीं कि वह नगर के गली-कूचों को 'टा-टा' कहके 'परदेस' उड़ जाता है।
कहते हैं कि 'परदेस' मे सैकड़ों ऐसे ठिकाने हैं जहां नौजवानों की बेहद ज़रूरत है। जहां हिन्दुस्तान के सभी प्रान्त के युवक काम की तलाश में आते हैं।
ठीक उसी तरह, जिस तरह महानगरों के युवक अच्छे भविष्य की तलाश में विदेश जाने को लालायित रहते हैं।
सुरसा के मुख से हैं ये औद्योगिक-मकड़जाल।
बेहतर जिंदगी की खोज में भटकते जाने कितने युवकों को निगलने के बाद भी सुरसा का पेट नहीं भरता। कभी उसका जी नहीं अघाता। उसकी डकार कभी किसी को सुनाई नहीं देती। तभी तो हिन्दुस्तान के सुदूर इलाकों से अनगिनत युवक अपनी फूटी किस्मत जगाने महानगरों की ओर भागे चले आते हैं।
अपनी जन्मभूमि, गांव-घर, मां-बाप, भाई-बहन, संगी-साथी और कमसिन प्रेमिकाओं को छोड़कर।
उन युवकों को दिखलाई देता है पैसा, खूब सारा पैसा। इतना पैसा कि जब वे अपने गांव लौटें तो उनके ठाट देखकर गांव वाले हक्के-बक्के रह जाएं।
आलोचक लोग दांतों तले उंगलियां दबाकर कहें कि बिटवा, निकम्मा-आवारा नहीं बल्कि कितना हुशियार निकला!
लेकिन क्या उनके ख्वाब पूरे हो पाते हैं।
हक़ीकतन उनके तमाम मंसूबे धरे के धरे रह जाते हैं।
रूपया कमाना कितना कठिन होता है, उन्हें जब पता चलता तब तक वे शहर के पेट की आग बुझाने वाली भट्टी के लिए ईंधन बन चुके होते हैं। शुरू में उन्हें शहर से मुहब्बत होती है। फिर उन्हें पता चलता है कि उनकी जवानी का मधुर रस चूसने वाली धनाढय बुढ़िया की तरह है ये शहर। जो हर दिन नए-नए तरीके से सज-संवरकर उन पर डोरे डालती है। उन्हें करारे-करारे नोट दिखाकर अपनी तरफ बुलाती है। सदियों के अभाव और असुविधाओं से त्रस्त ये युवक उस बुढ़िया के इशारे पर नाचते चले जाते हैं।
बुढ़िया के रंग-रोगन वाले जिस्म से उन्हें घृणा हो उठती है, लेकिन उससे नफ़रत का इज़हार कितना आत्मघाती होगा उन्हें इसका अंदाज़ रहता है।
उन्हें पता है कि देश में भूखे-बेरोजगार युवकों की कमी नहीं। बुढ़िया तत्काल दूसरे नौजवान तलाश लेगी।
शहर में रहते-रहते वे युवक गांव में प्रतीक्षारत अपनी प्रियतमा को कब बिसर जाते हैं, उन्हें पता ही नहीं चल पाता है। उनकी सम्वेदनाएं शहर की आग में जल कर स्वाहा हो जाती हैं। वे जेब में एक डायरी रखते हैं। जिसमें मतलब भर के कई पते, टेलीफोन नम्बर वगैरा दर्ज रहते हैं, सिर्फ उसे एक पते को छोड़कर, जहां उनका जन्म हुआ था। जिस जगह की मिट्टी और पानी से उनके जिस्म को आकार मिला था। जहां उनका बचपन बीता था। जहां उनके वृध्द माता-पिता हैं, जहां खट्ठे-मीठे प्रेम का 'ढाई आखर' वाला पाठ पढ़ा गया था। जहां की यादें उनके जीवन का सरमाया बन सकती थीं।
हां, वे इतना ज़रूर महसूस करते कि अब इस शहर के अलावा उनका कोई ठिकाना नहीं।
पता नहीं, शहर उन्हें पकड़ लेता है या कि वे शहर को जकड़ लेते हैं।
एक भ्रम उन्हें सारी ज़िन्दगी शहर में जीने का आसरा दिए रहता है कि यही है वह मंज़िल, जहां उनकी पुरानी पहचान गुम हो सकती है।
यही है वह संसार जहां उनकी नई पहचान बन पाई है।
यही है वह जगह, जहां उन्हें 'फलनवा के बेटा' या कि 'अरे-अबे-तबे' आदि सम्बोधनों से पुकारा नहीं जाएगा। जहां उनका एक नाम होगा जैसे- सलीम, श्याम, मोहन, सोहन.......
यही है वह दुनिया, जहां चमड़ी की रंगत पर कोई ध्यान नहीं देगा। आप गोरे हों या काले, लम्बे हों या नाटे। महानगरीय-सभ्यता में इसका कोई महत्व नहीं है।
यही है वह स्थल, जहां वे होटल में, बस-रेल में, नाई की दुकान की दुकान में, सभी के बराबर की हैसियत से बैठ-उठ सकेगे।
यहीं है वह मंज़िल, जहां उनकी जात-बिरादरी और सामाजिक हैसियत पर कोई टिप्पणी नहीं होगी, जहां उनके सोने-जागने, खाने-पीने और इठलाने का हिसाब-किताब रखने में कोई दिलचस्पी न लेगा। जहां वे एकदम स्वतंत्र होंगे। अपने दिन और रात के पूरे-पूरे मालिक।
लेकिन क्या यह एक भ्रम की स्थिति है? क्या वाकई ऐसा होता है?
फिर भी यदि यह एक भ्रम है तो भी 'दिल लगाने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है।'। इसी भ्रम के सहारे वे अन्जान शहरों में जिन्दगी गुज़ारते हैं। आजीवन अपनी छोटी-छोटी, तुच्छ इच्छाओं की पूर्ति के लिए संघर्षरत रहते हैं।
कितने मामूली होते हैं ख्वाब उनके!
एक-डेढ़ घण्टे की लोकल बस या रेल-यात्रा दूरी पर मिले अस्थाई काम। एक छोटी सी खोली। करिश्मा कपूर सा भ्रम देती पत्नी। अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते बच्चे। टीवी, फि्रज़, कूलर। छोटा सा बैंक बैलेंस कि हारी-बीमारी में किसी के आगे हाथ न पसारना पड़े।
विडम्बना देखिए कि उन्हें पता भी नहीं चलता और एक दिन यथार्थ वाली दुनिया बिखर जाती । उस स्वप्न-नगरी के वे एक कलपुर्जे बन जाते।
गांव-गिरांव से उन्हें खोजती-भटकती खबरें आकर दस्तक देतीं कि बच्चों के लौट आने की आस लिए मर गए बूढ़े मां-बाप।
खबरें बतातीं कि छोटे भाई लोग ज़मींदार की बेकारी खटते हैं और फिर सांझ ढले गांजा-शराब में खुद को गर्क कर लेते हैं।
खबरें बतातीं कि उनकी जवान बहनें अपनी तन-मन की ज़रूरतें पूरी न होने के कारण सामन्तों की हवस का सामान बन चुकी हैं।
खबरें बतातीं कि उनकी मासूम महबूबाओं की इंतज़ार में डूबी रातों का अमावस कभी खत्म नहीं हुआ।
इस तरह एक दिन उनका सब-कुछ बिखर जाता।
ये बिखरना क्या किसी नव-निर्माण का संकेत तो नहीं ?
Pasted from <http://www.hindinest.com/kahani/2009/009.htm>
खाला का दबाव था, सो खालू को 'एक्शन' में आना ही था।
खालू उसे 'मदीना टेलर' के मालिक बन्ने उस्ताद के पास ले आए।
मस्जिद पारा में स्थित यतीमखाना के सामने अंजुमन कमेटी की तरफ से तीन दुकानें बनाई गई हैं। इन दुकानों से यतीमखाना के प्रबंध के लिए आय हो जाती है। ये सभी दुकानें मुसलमान व्यापारियों को ही दी जातीं। एक दुकान में आटा चक्की थी, दूसरे में किराने का सामान और तीसरी दुकान के माथे पर टंगा बोर्ड--मदीना टेलर,
सूट-स्पेशलिस्ट
मदीना टेलर के मालिक थे बन्ने उस्ताद। बन्ने उस्ताद एक पारम्परिक दर्ज़ी थे। कहते हैं शुरू में वे लेडीज़ टेलर के नाम से जाने जाते थे। पैसे कमाकर स्वयं कारीगर रखने लगे, और तब अचानक नाम वाले बन गए। आजकल शादी-ब्याह के अवसर पर मध्यम वर्गीय परिवार दूल्हे के लिए कोट-पैंट ज़रूर बनवाते हैं। शादी मे जो एक बार थ्री-पीस सूट लड़का पहन लेता है, फिर अपनी ज़िन्दगी में अपने खर्चे से वह कहां एक भी सूट सिलवा पाता है। यदि किस्मत से बेटे का बाप बना तो फिर भावी समधी के बजट पर बेटे की शादी में कोट सिलवा सके तो उसका भाग्य! बन्ने उस्ताद शहर से अच्छे कारीगर उठा लाए थे, जिसके कारण उनकी दुकान ठीक चला करती।
उनकी वेशभूषा बड़ी हास्यास्पद रहती। अलीगढ़ी पाजामे पर कढ़ाई वाला बादामी कुर्ता। आंखें इस तरह मिचमिचाते ज्यों बहुत तेज़ धूप में कहीं दूर की चीज़ को गौर से देख रहे हों। हंसते-बोलते तो ऊबड़-खाबड़ मैले दांतों के कारण चेहरा चिम्पैंजी सा दिखाई देता।
यूनुस, बन्ने उस्ताद का हुलिया देख बमुश्किल-तमाम अपनी हंसी रोक सका।
खालू के सामने उन्होंने यूनुस को बड़े प्यार से अपने पास बुलाया। यूनुस ने उन्हें सलाम किया तो बन्ने उस्ताद ने मुसाफ़ा के लिए हाथ बढ़ाया।
यूनुस का हाथ अपने हाथों में लेकर बड़ी देर तक नसीहतों की बौछार करते रहे।
''दर्जीगिरी आसान पेशा नहीं बरखुरदार! टेढ़े-मेढे कपड़े सिलकर आज कोई भी दर्जी बन जाता है, हैना...! बड़ा मुश्किल हुनर है टेलरिंग, समझे। शहर के तमाम नामवर टेलर मेरे शागिर्द रहे हैं। 'पोशाक-टेलर्स'वाला मुनव्वर अंसारी हो या 'माडर्न-टेलर' वाले कासिम मियां, सभी इस नाचीज़ की मार-डांट खाकर आज शान से कमा-खा रहे हैं, हैना...''
खालू उनकी बात के समर्थन में सिर हिला रहे थे।
यूनुस का हाथ उस्ताद ने छोड़ा नहीं था, कभी उनकी पकड़ हल्की पड़ती कभी सख्त। यूनुस चाहता उसके हाथ पकड़ से आज़ाद हो जाएं, लेकिन उसने महसूस किया कि उसकी जद्दोजेहद को बन्ने उस्ताद भांप रहे हैं।
वे बड़ी व्यग्रता से अपना यशोगान कर रहे थे और यूनुस की हथेली पसीने से भींग गई। उसने खालू को देखा जो निर्विकार बैठे थे।
अचानक बन्ने उस्ताद ने उसे अपने समीप खींचा। यूनुस ने सोचा कि कहीं ये गोद में बिठाना तो नहीं चाहते।
उसके जिस्म ने विरोध किया।
उसके बदन की ऐंठन को उस्ताद ने महसूस किया और हाथ छोड़ यूनुस की पीठ सहलाने लगे--''देखो बरखुरदार, हां क्या नाम बताया तुमने अपना....हां यूनुस। यहां कई लड़के काम सीख रहे हैं, हैना... उनसे गप्पबाजी मत करना। जैसा काम मिले, काम करना। सिलाई मशीन चलाने की हड़बड़ी मत दिखाना। सीनियरों की बातें मानना। मुझे शिकायत मिली तो समझो छुट्टी हैना...। यदि लगन रहेगी तो एक दिन तुम भी नायाब टेलर बन जाओगे, हैना... ''
बन्ने उस्ताद की नसीहतें उसकी समझ में न आईं।
हां, उनके मुंह से निकलती पायरिया की बदबू से उसका दम ज़रूर घुटने लगा था।
यूनुस ने उस्ताद के हाथों को अपने जिस्म की बोटियों का हिसाब लगाते पाया। उसने देखा कि दुकान के कारीगर और लड़के मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं।
लिहाजा उसने 'मदीना टेलर' जाना शुरू कर दिया।
वह सुबह खाला के घर नाश्ता करके निकलता था। दुपहर दो से तीन बजे तक खाना खाने की मुहलत मिलती और रात आठ बजे लड़कों को छुट्टी मिलती। कारीगर ठेका के मुताबिक काफी रात तक काम में व्यस्त रहते। तीज-त्योहार या शादी-ब्याह के अवसर पर तो सारी रात मशीनें चलती रहतीं।
यूनुस का मन दुकान में रमने लगा था। धीरे-धीरे सहकर्मी लड़कों से उसे बन्ने उस्ताद के बारे में कई गोपनीय सूचनाएं मिलने लगीं।
दुकान में चार सिलाई मशीनें और एक पीको-कढ़ाई की मशीन थी। सामने एक तरफ बन्ने उस्ताद का काउण्टर था। मशीनों के पीछे फर्श पर दरी बिछी हुई थी, जिस पर शागिर्दों का अड्डा होता। यहां काज-बटन,तुरपाई और तैयार कपड़े पर प्रेस करने का काम होता।
तीनों शागिर्दों से यूनुस का परिचय हुआ। ये सभी बारह-तेरह बरस के कमसिन बच्चे थे।
नाटे क़द का बब्बू गठीले बदन का था और यतीमखाने में हाफ़िज़ बनने आया था। यतीमखाने की जेल और कठोर अनुशासन से तंग आकर वह बन्ने उस्ताद के यहां टिक गया।
दूसरे का नाम जब्बार था जो पास के गांव की विधवा का बेटा था।
तीसरा बड़ा हीरो किस्म का लड़का था। बिहार के छपरा जिले का रहने वाला। भुखमरी से तंग आकर अपने मामू के घर आया तो फिर यहीं रह गया। गोरा- चिकना खूबसूरत शमीम। बन्ने उस्ताद का मुंहलगा शागिर्द।
शमीम के पीठ पीछे जब्बार और बब्बू उसे 'बन्ने उस्ताद का लौंडा' नाम से याद करते और अश्लील इशारा करके खूब हंसते।
बब्बू से यूनुस की खूब पटती।
उसने यूनुस को अपनी रामकहानी कई खण्डों में बताई थी। उनके बीच में खूब निभती। बन्ने उस्ताद उन्हें सिर जोड़े देखते तो काउण्टर से चिल्लाते--''ए लौंडों! ग्प मारने आते हो का इहां?''
बब्बू झारखण्ड का रहने वाला था। उसके अब्बा बचपन में मर गए थे। वह पेशे से धुनिया थे। नगर-नगर फेरी लगाकर रजाई-गद्दे बनाया करते। उनका कोई पक्का पड़ाव न था। खानाबदोशों सी ज़िन्दगी थी।
अब्बा के इंतेकाल के दो साल बाद उसकी अम्मी ने दूसरी शादी कर ली। सौतेला बाप बब्बू और उसकी बहिन से नफ़रत करता। बहिन तो छोटी थी। उसे नफ़रत-मुहब्बत में भेद क्या पता? हां, बब्बू घृणा से भरपूर आंखों का मतलब समझने लगा था। अल्ला मियां से यही दुआ मांगा करता कि उसे इस दोज़ख से जल्द निजात मिल जाए।
तभी गांव आए मौलवी साहब ने उससे मध्यप्रदेश चलने को कहा। बताया कि वहां मुसलमानों की अच्छी आबादी है। एक यतीमखाना भी अभी-अभी खुला है। बच्चे वहां कम हैं। यतीमखाने में खाने-रहने की समस्या का समाधान हो जाएगा, साथ ही दीनी तालीम भी वह हासिल कर लेगा।
कहते हैं कि खानदान में यदि कोई एक व्यक्ति कुरआन मजीद को हिफ्ज़ (कंठस्थ) कर ले तो उसकी सात पुश्तों को जन्नत में जगह मिलती है। इससे दुनिया सध जाएगी और आख़िरत (परलोक) भी संवर जाएगी। बब्बू की अम्मा मौलवी साहब की बातों से प्रभावित हुईं और इस तरह बब्बू उनके साथ यहां आ गया।
मस्जिद की छत पर बड़े-बड़े तीन हाल थे।
एक हाल में मौलवी साहब रहा करते। दूसरे हाल में मदरसा चलाया जाता। तीसरा हाल यतीम बच्चों के लिए था।
नहाने-धोने के लिए मस्जिद के बाहर एक कुंआ था, जिसमें तकरीबन दस फुट नीचे पानी मिलता था। यह बारहमासा कुंआ था जो कभी न सूखता। सम्भवत: समीप के नाले के कारण ऐसा हो।
पेशाब और वज़ू के लिए तो मस्जिद ही में व्यवस्था थी, किन्तु पाखाने जाने के लिए डब्बा लेकर मस्जिद के उत्तर तरफ लिप्टस के जंगल की तरफ जाना पड़ता था। शुरू के कुछ दिन बब्बू का मन वहां खूब लगा,किन्तु वह गांव के उस आज़ाद परिंदे की तरह था जिसे पिंजरे में कैद रहना नापसंद हो।
वहां की यांत्रिक दिनचर्या से उसका मन उचट गया।
फजिर की अज़ान सुबह पांच बजे होती। अज़ान देने से पहले मुअज्ज़िन चीखते हुए किसी जिन्नात की तरह आ धमकता-''शैतान के बहकावे में मत आओ लड़कों। जाग जाओ।''
सुबह के समय ही तो बेजोड़ नींद आती है। ऐसी नींद में विध्न डालना शैतान का काम होना चाहिए। मुअज्ज़िन खामखां शैतान को बदनाम किया करता। उन मासूम बच्चों की नींद के लिए शैतान तो वह स्वयं बन कर आता।
मुअज्ज़िन मरदूद आकर जिस्म से चादरें खींचता, और बेदर्दी से उन्हें उठाता। बड़े हाफ़िज्जी के डर से लड़के विरोध भी न कर पाते। जानते थे कि यदि मुअज्ज़िन ने बड़े हाफिज्जी से शिकायत कर दी तो ग़ज़ब हो जाएगा।
किसी तरह मन मानकर लड़के उठते।
आंखें मिचमिचाते कोने में पर्दा की गई जगह पर जाकर ढेर सारा मूतते।
हुक्म था कि नींद में यदि कपड़े या जिस्म नापाक हो गया हो तो नहाना फ़र्ज है। नापाक बदन से नमाज़ अदा करने पर अल्लाह तआला गुनाह कभी माफ़ नहीं करते। ये गुनाह-कबीरा है। उसने किसी लड़के को सुबह उठने के साथ नहाते नहीं देखा था। हां, मुअज्ज़िन या हाफ़िज्जी ज़रूर किसी-किसी सुबह नहाया करते थे। इसका मतलब वे रात-बिरात नापाक हुआ करते थे।
उसे तो वज़ू करना भी अखरता था। कई बार उसने क़ायदे से आंख-मुंह धोए बगैर नमाज़ अदा की थी। बाद में दुआ करते वक्त वह अल्लाह तआला से अपनी इस ग़ल्ती के लिए माफ़ी मांग लिया करता था।
एक सुबह उसने पाया कि उसका पाजामा सामने की तरह गीला-चिपचिपा है। उसने अपने साथी महमूद को यह बात बतलाई थी। फिर उसी हालत में बिना नहाए उसने नमाज़ अदा की थी।
महमूद मुअज्ज़िन का चमचा था।
उसने मुअज्ज़िन को सारी बात बताई और मुअज्ज़़िन ने उसकी पेशी हाफ़िज्जी के सामने कर दी।
हाफ़िज्जी ने उसके बदन पर छड़ी से खूब धुलाई की।
वह खूब रोया।
उसने यतीमखाना से भाग जाने की योजना बनाई।
बन्ने उस्ताद की दुकान में लड़कों को काम करते देख वह 'मदीना-टेलर' गया। बन्ने उस्ताद ने उसे काम पर रख लिया। मौलवी साहब और हाफिज्जी ने बारहा चाहा कि बब्बू यतीमखाना लौट आए, किन्तु बब्बू ने उस मस्जिद में जाना क्या जुमा की नमाज़ प्ढ़ना भी बंद कर दिया। वह जुमा प्ढ़ने एक मील दूर की मस्जिद में जाया करता था।
वहां चार कारीगर थे। उनमें से तीन पतले-दुबले युवक थे, जो चौखाने की लुंगी और बनियाइन पहने सिर झुकाए मशीन से जूझते रहते। घण्टे-डेढ़ घण्टे बाद कोई एक बीड़ी पीने दुकान से बाहर निकलता। बाकी दो उसके लौटने का इंतज़ार करते। वे एक साथ दुकान खाली न करते। दुकान में काम की अधिकता रहती।
चौथा कारीगर सुल्तान भाई थे। इन्हें बन्ने उस्ताद फूटी आंख न सुहाते, लेकिन सुल्तान भाई बड़ी 'गुरू' चीज़ थे।
बन्ने उस्ताद की अनुपस्थिति में सुल्तान भाई के हाथों दुकान की कमान रहती।
जब बन्ने भाई दुकान में मौजूद रहते तब अक्सर सुल्तान भाई के लिए उस्तानी का घर से बुलावा आता। कभी बन्ने भाई स्वयं सुल्तान भाई को यह कह कर रवाना किया करते कि मियां घर चले जाओ, बेगम ने आपको याद किया है। हैना...
सुल्तान भाई तीस-पैंतीस के छरहरे युवक थे। हमेशा टीप-टाप रहा करते।
धीरे-धीरे यूनुस ने जाना कि सुल्तान भाई का बन्ने उस्ताद की बीवी के साथ चक्कर चलता है। बन्ने उस्ताद अपने चिकने शागिर्द छपरइहा लौंडे शमीम के इश्क में गिरफ्तार हैं और जागीर लुटाने को तैयार रहते हैं।
'मदीना टेलर' में तीन माह गुज़ारे थे उसने। इस अवधि मे उससे काज-बटन, तैयार कपड़ों में प्रेस और तुरपाई के अलावा कोई काम न लिया गया। काज-बटन लगाते और तुरपाई करते उसकी उंगलियां छिद गईं। सुई के बारीक छेद में धागा डालते-डालते आंखें दुखने लगीं, लेकिन उस्ताद उसे कैंची और इंची टेप पकड़ने न देते।
कारीगर सत्तर-अस्सी की रफ्तार में सिलाई मशीन दौड़ाते। जाने कितने मील सिलाई का रिकार्ड वे बना चुके होंगे। यूनुस का मन करता कि उसे भी 'एक्को बार' सिलाई मशीन चलाने का मौका मिल जाता।
ऐसा ही दुख उसे तब भी हुआ था जब तकरीबन साल भर दिल लगाकर फील्डिंग करवाने के बाद भी उन नामुराद लड़कों ने उसे बल्लेबाजी का अवसर प्रदान नहीं किया था।
हुआ ये कि मुहल्ले में मुगदर के बल्ले और कपड़े की गेंद से क्रिकेट खेलते-खेलते उसके मन में आया कि वह भी असली क्रिकेट क्यों नहीं खेल सकता है?
वह नगर के अमीर लड़कों की जी-हुजूरी करते-करते उनके साथ क्रिकेट खेलने जाने लगा था।
डॉक्टर चतुर्वेदी का लड़का बन्टी और दवा दुकान वाले गोयल का लड़का सुमीत क्रिकेट टीम के सर्वेसर्वा थे। बाहर से उन लोगों ने क्रिकेट का काफी सामान मंगवाया था। मैदान के पीछे चपरासी का घर था, जहां वे लोग खेल का सामान रखते थे। उन लोगों के पास असली बेट, बॉल, स्टम्प्स, ग्लब्स, हेलमेट और लेग गार्ड आदि सामान थे।
जब उसने साल भर के निष्ठापूर्ण खेल सहयोग के एवज़ में बल्लेबाजी का अवसर पाने की बात कही तो वे सभी हंस पड़े।
बंटी ने कहा कि यदि वह वाकई क्रिकेट के लिए सीरियस है तो उसे एक सौ रूपए महीने की मेम्बरशिप देनी होगी।
''झोरी में झांट नहीं सराए में डेरा''--यही तो कहा था सुमीत ने।
मन मसोस कर रह गया था यूनुस।
वहां बल्लेबाजी करने को न मिली और यहां बन्ने उस्ताद के सख्त आदेश के कारण सिलाई मशीन पर हाथ साफ करने का मौका न मिल पा रहा था।
घर में हाथ से चलने वाली सिलाई मशीन है। अम्मा को सिलाई आती नहीं थी। अब्बू ही कभी सिलाई करने बैठते तो यूनुस या बेबिया से हैंडल घुमाने को कहते। उस मशीन में सिलाई बहुत धीमी गति से होती। पैर से चलने वाली मशीन यूं फ़र्र...फ़र्र... चलती कि क्या कहने!
बन्ने उस्ताद कभी मूड में होते तो बताते कि बड़े शहरों में आजकल बिजली के मोटर से 'एटोमेटिक' मशीनें चलती हैं। ऐसी-ऐसी दुकानें हैं जहां सैकड़ों मशीनें घुरघुराती रहती हैं।
यहां जैसा नहीं कि एक दिन में एक कारीगर दो जोड़ी कपड़े सिल ले, तो बहुत। वहां एक आदमी एक बार में कोई एक काम करता है। जैसे कुछ लोग सिर्फ कालर सिलते हैं। कुछ आस्तीन सिलते हैं। कुछ आगा तैयार करते हैं। कुछ पीछा तैयार करते हैं। कुछ कारीगरों के पास आस्तीन जोड़ने का काम रहता है। कुछ के पास कालर फिट करने का काम। कुछ कारीगर 'फाईनल टच' देकर कपड़े को तैयार माल वाले सेक्शन भेज देते हैं। जहां कपड़े पर प्रेस किया जाता है और उन्हें डबबों में बंद किया जाता है। एकदम किसी फेक्ट्री की तरह होता है सारा काम।
यूनुस इच्छा ज़ाहिर करता कि कपड़ा कटिंग का काम मिल जाए या सिलाई मशीन में ही बैठने दिया जाए।
बन्ने उस्ताद हिकारत से हंसकर जवाब देते--''अभी तो मंजाई चल रही है मियां, इतनी जल्दी उस्तादी सिखा दी तो मेरी हंसाई होगी। लोग कहेंगे कि बन्ने उस्ताद ने कैसा शागिर्द तैयार किया है।''
इसके अलावा बन्ने उस्ताद की एक आदत उसे नापसंद थी। बन्ने उस्ताद काम सिखाते वक्त उसकी जांघ पर चिकोटियां काटते, पीठ थपथपाते और उनका हाथ कब बहककर कमर के नीचे पहुंच जाता उन्हें ख्याल ही न रहता।
उनकी अनुपस्थिति में लड़के उस्ताद की हरकतों पर खूब मज़ाक किया करते।
चुंधियाई आंखों और मैले दांतों वाले बन्ने उस्ताद के मुंह से बदबू फूटा करती थी।
जल्द ही बन्ने उस्ताद की शागिर्दी से उसने स्वयं को आजाद कर लिया। उसने जान लिया था कि टेलर-मास्टर कभी लखपति बनकर ऐश की ज़िंदगी नहीं गुज़ार पाता। वह तो ताउम्र 'टेलरई' ही करता रह जाता है।
इससे कहीं अच्छा है कि यूनुस मन्नू भाई से स्कूटर, मोटर-साइकिल की मिस्त्रीगिरी सीखे।
पंद्रह
यूनुस की विद्यालयीन पढ़ाई ही खटाई में पड़ी थी, किसी विश्वविद्यालय का मुंह देखना उसके नसीब में कहां था?
वैसे भी हर किसी के मुक़द्दर में विश्वविद्यालयीन पढ़ाई का 'जोग' नहीं होता।
फुटपथिया लोगों का अपना एक अलग विश्वविद्यालय होता है, जहां व्यवहारिक-शास्त्र की तमाम विद्याएं सिखाई जाती हैं।
हां, फ़र्क बस इतना है कि इन विश्वविद्यालयों में 'माल्थस' की थ्योरी पढ़ाई जाती है न डार्विन का विकासवाद।
छात्र स्वमेव दुनिया की तमाम घोषित, अघोषित विज्ञान एवम् कलाओं में महारत हासिल कर लेते हैं।
प्राध्यापकीय योग्यता के लिए शिक्षा और उम्र का बंधन नहीं होता। वे अनपढ़ हो सकते हैं, बुजुर्ग या बच्चे भी हो सकते हैं। कभी-कभी तो पशुओं के क्रिया-व्यापार से भी ये फुटपथिया विद्यार्थी ज्ञान अर्जित कर लेते हैं।
ये अनौपचारिक प्राध्यापक अपने विद्यार्थियों को जीने की कला सिखाते हैं।
जो विद्यार्थी जितना तेज़ हुआ, वह उतनी जल्दी व्यवहारिक ज्ञान ग्रहण कर लेता है। संगत के कारण विद्यार्थी निगाह बचा कर ग़लत काम करने, बहाना बनाने और बच निकलने का हुनर सीख जाता है। यहां सिखाया भी तो जाता है कि जो पकड़ा गया वही चोर। जो पकड़ से बचा वह बनता है गलियों का बेताज बादशाह।
इन विश्वविद्यालयों की कक्षाएं उजाड़-खण्डहरात में, गैरेजों में, सिनेमा-हाल और चाय-पान की गुमटियों में लगती हैं।
'प्रेक्टिकल-ट्रेनिंग' के लिए नगर के आवारा-लोफ़र, गंजेड़ी-भंगेड़ी, दुराचारी-बलात्कारी, युवकों की संगत ज़रूरी होती है।
बस-ट्र्रक चालकों और खलासियों से भूगोल, नागरिक शास्त्र और भारतीय दंड-विधान का सार सरलता से उनकी समझ में आ जाता है।
मोटर गैरेज में काम सीख कर मेकेनिकल-इंजीनियरिंग और आटो-मोबाइल इंजीनियरिंग का कोर्स पूरा किया जाता है।
दर्जियों की दुकान में बैठकर 'ड्रेस-डिज़ाइनर' और 'फैशन-टेक्नोलॉजी' की डिग्री मिल जाती है।
नाई की दुकान से 'ब्यूटी पार्लर' का डिप्लोमा मिल जाता है।
सिविल ठेकेदार के पास मुंशीगिरी कर लेने के बाद आदमी आसानी से सिविल इंजीनियर जितनी योग्यता प्राप्त कर लेता है।
विद्युत ठेकेदार के पास काम सीखने पर इलेक्ट्रीशियन का डिप्लोमा मिला समझो।
काम-शास्त्र के सैध्दांतिक पक्ष से वे कमसिनी में ही वाकिफ हो जाते हैं और प्रेक्टीकल का अवसर निम्न-मध्यम वर्गीय समाजों में उन्हें सहज ही मिल जाता है। चचेरे-ममेरे भाई-बहिन, चाचा-मामा,बुआ-चाची-मामी, नौकर-नौकरानी, पिता या अध्यापक, इनमें से कोई एक या अधिक लोग उन्हें व्यस्क अनुभवों से मासूम बचपन ही में पारंगत बना देते हैं।
राजनीति-शास्त्र सीखने के लिए कहीं जाने की ज़रूरत नहीं। आजकल हर चीज में 'पोलिटिक्स' की बू आती है।
यूनुस और उसके जैसे तमाम सुविधाहीन बच्चे ऐसी ही विश्वविद्यालयों के छात्र थे।
बड़े भाई सलीम की असमय मृत्यु से ग़मज़दा यूनुस को एक दिन उसके आटोमोबाईल इंजीनियरिंग के प्राध्यापक यानी मोटर साइकिल मिस्त्री मन्नू भाई ने गुरू-गम्भीर वाणी में समझाया था--''बेटा मैं पढ़ा-लिखा तो नहीं लेकिन 'लढ़ा' ज़रूर हूं। अब तुम पूछोगे कि ये लढ़ाई क्या होती है तो सुनो, एम्मे, बीए जैसी एक डिग्री और होती है जिसे हम अनपढ़ लोग 'एलेलपीपी' कहते हैं। जिसका फुल फार्म होता है, लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर, समझे। इस डिग्री की पढ़ाई फ़र्ज-अदायगी के मदरसे में होती है जहां मेहनत की कापी और लगन की कलम से 'लढ़ाई' की जाती है।''
यूनुस मन्नू भाई की ज्ञान भरी बातें ध्यान से सुना करता।
असुविधाओं से भरपूर अव्यवस्थित घरेलू माहौल में स्कूली शिक्षा की किसे फ़िक्र!
वह अच्छी तरह जानता था कि अकादमिक तालीम उसके बूते की बात नहीं।
उसे भी अब इस 'लढ़ाई' जैसी कोई डिग्री बटोरनी होगी।
इसीलिए वह मन्नू उस्ताद की बात गिरह में बांध कर रक्खे हुए था।
मन्नू भाई की छोटी सी मोटर-साइकिल रिपेयर की गैरेज थी।
नगर के बाहर पहाड़ी नाले के पुल को पार करते ही दुचकिया, तिनचकिया, चरचकिया, छ'चकिया जैसी तमाम गाड़ियों की मरम्मत के लिए गैरेज हैं। टायरों मे हवा भरने वाले बिहारी मुसलमानों की दुकानें भी इधर ही हैं।
मन्नू भाई की गैरेज पुल पार करते ही पहले मोड़ पर है।
बन्ने उस्ताद के दर्जीगिरी वाले अनुभव से मायूस यूनुस को गैरेज का माहौल ठीक लगा।
गैरेज के अंदर एक लकड़ी का बोर्ड था, जिस पर क्रम से पाना-पेंचिस आदि सजा कर टांग दिए जाते। यूनुस का काम होता, सुबह मन्नू भाई के घर जाकर उनसे गैरेज की चाभी ले आता। एक बित्ते का एक झाड़ू था,जिससे वह पहले गैरेज के बाहर सफाई करता। फिर गैरेज का शटर उठाता। अंदर रिपेयर के लिए आई स्कूटर-मोटर साइकिलें बेतरतीबी से रखी रहतीं। एक-एक कर तमाम गाड़ियों को वह गैरेज से बाहर निकालता। फिर गैरेज के अंदर झाड़ू लगाता। इस बीच कोई नट-बोल्ट, वाशर या कोई अन्य पार्ट गिरा मिलता तो उसे उठाकर यथास्थान रख देता। मन्नू भाई के आने से पूर्व यदि कोई कस्टमर आता तो वह उनकी समस्या सुनता और उसके लायक रिपेयर का काम होता तो कर देता।
इस छोटी-मोटी रिपेयरिंग से अपना जेब-खर्च बनाता।
रात गैरेज बंद होने से पहले वह तमाम पाना-पेंचिस को जले मोबिल से धोता, पाेंछता और फिर उन्हें दीवार पर टंगे बोर्ड पर क्रमानुसार सजा देता।
मन्नू भाई और यूनुस मिलकर मरम्मत के लिए तमाम गाड़ियों को गैरेज के अंदर ठूंसते।
यूनुस जब घर जाने के लिए सलाम करता तो मन्नू भाई उसे रोकते और फिर कभी दस, कभी बीस रूपए का नोट पकड़ा देते।
अपनी इस छोटी-मोटी कमाई से यूनुस बहुत खुश रहता।
नन्हा यूनुस बड़ा जहीन था...
कहा भी जाता है कि ये सिक्खड़े-सरदार और म्लेच्छ-मुसल्ले बड़े हुनरमन्द होते हैं। तकनीकि दक्षता में इनका कोई सानी नहीं।
मेहनत और मरम्मत के काम ये कितनी सफाई से करते हैं। नाई, दर्जी और सब्जियों की दुकानें अधिकांशत: मुसलमानों की हैं। अण्डा, मुर्गा, मछली और गोश्त की दुकानों पर भी मुसलमानों का क़ब्ज़ा है।
बाबरी-मस्जिद गिराए जाने के बाद नगर में हिन्दू कसाइयों ने 'झटका' वाली दुकानें लगाईं। हमीद चिकवा बताता है कि उन लोगों ने अपनी मीटिंग में फैसला लिया है कि 'गर्व से कहो हम हिन्दू हैं' का नारा लगाने वाले राष्ट्रीय हिन्दू यदि मांसाहारी हैं तो वे मुसलमान चिकवों से गोश्त न खरीदें, बल्कि'झटका' वाली दुकानों से गोश्त खरीदें।
इससे मुसलमानों के इस एकक्षत्र व्यवसाय पर कुछ तो प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
सिक्खड़ों को तो सन् चौरासी में औकात बता दी गई थी। मुसल्लों को गोधरा के बहाने गुजरात में तगड़ा सबक़ सिखा दिया गया।
सिख तो समझ गए और मुख्यधारा में आ गए, लेकिन इन म्लेच्छ-मुसलमानों को ये कंाग्रेसी और कम्यूनिस्ट चने के झाड़ पर चढ़ाए रखते हैं। और वो जो एक ठो ललुआ है, वो चारा डकार कर मुसलमानों का मसीहा बना बैठा है।
यूनूस ने कम-उम्र में ही जान लिया था कि उसके अस्तित्व के साथ ज़रूर कुछ गड़बड़ है।
चौक के तिलकधारी मुनीमजी कहा करते--''अगर ये हमारे छद्म धर्मनिरपेक्षवादी नपुंसक हिंदू शांत रहें तो'आर-पार' की बात हो ही जाए। सेकूलर कहते हैं ये शिखण्डी साले खुद को।''
उनके हमख़याल चौबेजी हां में हां मिलाते--''हिंदू हित की बात करने वाले को ये चूतिए साम्प्रदायिक कहते हैं। हमें अछूत समझते हैं।''
शिशु मंदिर के प्रधानपाठक विश्वकर्मा सर कहां चुप रहते, वैसे भी उन्हें गुरूर था कि वह इस कस्बे के सर्वमान्य बुध्दिजीवी हैं, किन्तु राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित मुनीमजी और चौबेजी उन्हें ज्यादा अहमियत नहीं देते--''अब समय आ गया है कि हम अपना 'होमलैण्ड' बना लें। इन मुसल्लों को द्वितीय नागरिकता मिले और इन्हें मताधिकार से वंचित किया जाए। तुष्टिकरण की सारी राजनीति स्वमेव खत्म हो जाएगी।''
अपने समय की चुनौतियों से बाख़बर और बेखबर यूनुस, मन्नू भाई को काम करते बड़े ध्यान से देखा करता।
उनकी हरेक स्टाइल की नक़ल किया करता।
मन्नू भाई चाय बहुत पीते थे।
कोई ग्राहक आया नहीं कि आर्डर कर देते--''यूनुस, तनि भाग कर चारठो चाय ले आ।''
वहीं यूनुस को चाय की आदत पड़ी।
मन्नू भाई को अल्सर हो गया था।
सुनत हैं कि अब वह इस दुनिया में नहीं है।
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